ज़नाव “चुप” हैं तो जरूर कोई बात है..??
‘वरना ! क्या ‘बात’ कहनी नहीं आती!!’
जी,बिल्कुल
नि:संदेह ! कभी कभी ऐसा भी होता है।
क्योंकि, संसार का हर प्राणी “परिस्थितियों का दास” तो है ही।
इस बात को जो इंसान जितनी जल्दी समझ जायेगा, उतनी जल्दी वह इस दुनियां में मानसिक तौर पर,तो सुखी हो ही जायेगा। अर्थात
वह जीवन में आने वाली परिस्थितियों से तालमेल बिठा सकेगा।
लोगों के जीवन में “परिस्थिति” वश आने वाली स्थितियों को किसी लेख में कवर करना संभव तो नहीं है परंतु कुछ परिस्थितियों की विवशता व्यक्ति दर व्यक्ति अलग अलग भी हो सकती है। ये ‘माइंड मेक अप’ सभी का होना चाहिए।
समझदारों के लिए सदैव इशारा ही काफ़ी होता है।
इस संदर्भ में आम आदमी की तो बात छोड़िए..चाहे राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय किसी पर पटल पर देख लीजिएगा.. अपने आपको सिकंदर समझने वाले भी जनता जनार्दन के आगे अक्सर हतप्रभ होते पाए गए हैं।
जैसे; कई एक संस्था प्रधान व विभागाध्यक्ष अपने ही कर्मों के अधीन “परिस्थितियों” के ऐसे दास होते देखें हैं, कि..कुछ पूछिएगा मत। जो गुरुर में सारी हदें पार करते चले जा रहे थे, वे ऐसे थम जाते हैं कि वश..वश..
देश के कुछ ही ‘समझदार नागरिक’ उन्हें “बगलें झांकने” को मजबूर कर देते हैं। आम जनता भी गर इन मौका परस्त लोगों के फेंके जाति,धर्म के मकड़ जाल से निकल आए, और अपनी ताकत का ठीक से उपयोग करने लगे, तो आप देखते जाइयेगा.. व्यवस्था सुदृढ़ होने में कोई बहुत ज्यादा वक्त लगता नहीं है। लेकिन अफसोस अधिकतर जनता लोगों के तुष्टिकरण के फॉर्मूला के अधीन कई बार कठपुतली बन जाती है।
हालांकि लोग अपनी झेंप मिटाने के लिए जनता के सामने थोड़ी बहुत बहरुपियागिरी,तो अवश्य दिखाते हैं।
अति “महत्वाकांक्षी व्यक्ति” होना भी एक अभिशाप है।
ये कहावत आपने भी सुनी होगी कि, “बिगड़ेल घोड़ों को सदैव “परिस्थिति” नामक चाबुक ही नियंत्रण में ले पाता है।”
यद्यपि ये कहावत सभी सांसारिक प्राणियों पर लागू होती है।
जब जब किसी ने तानाशाही से अपने अधीन भोले भाले लोगों को मद में आकर “आम को बबूल” कहल वाने का दंभ भरा है, वक्त ने तब तब ऐसी करवट बदली है कि, फिर सब उस तानाशाह की चाहत के परे ही हुआ है।
कई बार वक्त लोगों को अपने आंख,मुंह और कानों पर इसी तरह पट्टी बांधने को बाध्य कर देता है। सब कुछ देखते-सुनते और समझने के बावजूद भी ऐसे रहना होता है कि जैसे कुछ जानते ही नहीं।
हालांकि, इस दुनिया बिच सारी स्थिति/परिस्थिति के लिए व्यक्ति स्वेम ही जिम्मेदार होता है। क्योंकि सारी परिस्थितियों की जड़ में उसके अपने कर्म ही होते हैं।
ध्यान रखिएगा!! समस्त यूनिवर्स को हैंडल करने वाली अथॉरिटी.. परम सत्ता यानी “ईश्वर” कभी भी परिस्थिति जनक नहीं हो सकते.. क्योंकि वे सदैव “मंगल भवन अमंगल हारी.. हैं।” उनका रॉल तो जीव के अमंगल अर्थात परिस्थिति को हरने का है, न कि देने का। धन्यवाद