242- चेतना

ह्यूमन ग्रॉस बॉडी अर्थात “मानवीय स्थूल शरीर” को मन, बुद्धि, चेतना (विवेक) की कठपुतली कह दिया जाए, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

मन,बुद्धि चेतना में से अमुक व्यक्ति के अधिकतर निर्णयों पर किसका प्रभाव झलकता है।ये ही वो मानक हैं जो किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्धारण करते हैं।

यदि किसी की “चेतना” जागृत हो जाए, तो फिर कहने ही क्या हैं!!! इसके बाद व्यक्ति की मानवीय संवेदनाएं ..अपनी सुसुप्ता अवस्था से निकल कर व्यक्ति के दैनिक लोक व्यवहार में अभिव्यक्त होने लगती हैं।

दरअसल, आध्यात्मिक नजरिए से ये सांसारिक जीवन, ईश्वर प्रदत्त “पूर्व निर्धारित नियत नटी”का एक खेल भर है।

” राजा, राणा,छत्रपति हाथिन के असवार।

जाना सबको एक दिन अपनी-अपनी बार।।”

क्षति,जल,पावक,गगन,समीरा।

पंचतत्व मिलि बना शरीर।।

कहना न होगा.. कि, विद्वानों ने अधिकतर पद्य,श्लोक आदि विधाओं के जरिए अपने शोध से “गागर में सागर” वाले अनुकरणीय विचार हमारे लिए सदैव कहीं न कहीं प्रस्तुत किए हैं। वो बात अलग है कि नई पीढ़ी उन तथ्यों को तवज्जो नहीं देती। क्योंकि आजकल छात्रों को ही नहीं अपितु सामान्यत: लोगों को भी “रीडिंग” करने की आदत कम ही है।

दूसरे प्रत्येक जीव का स्थूल शरीर शुभ अशुभ कर्मों के साथ साथ प्रकृति जनित “पांच तत्वों” से निर्मित होता है। जिसे जन्म के समय मृत्युलोक में आते वक्त दो खातों से नवाजा गया हैं..

खाता नंबर 1 सांसों का ..निश्चित अमाउंट

खाता नंबर 2 कर्मों का..हिसाब किताब..”प्रारब्ध” जीव के कई जन्मों के संचित कर्मों को अपने अंदर स्टोर रखता है।

ऐसा अक्सर देखा गया है कि लोगों की सांसारिक जिम्मेदारियां,जीवन की भागमभाग लगभग पूरी हो गई है। मगर विस्तर पर लेटे लेटे “सांसों” का हिसाब पूरा करने के बाद ही दुनियां से जाना हो पाता है।

किसी किसी की सांसें जीवन की भगमभाग के दौरान रास्ते में ही टूट जाती हैं। सवाल वही है..?? खाता खाली होने पर.. प्रत्येक स्थूल शरीर (युवा/वृद्ध) जिस भी अवस्था में है..फिर से “पंच तत्व” में विलीन होकर “मृत्यु” को प्राप्त हो जाता है। फिर चाहे आप कुछ भी कर लीजिएगा..ये सच ही है, “टूटी को बूटी ” नहीं है।

जबकि हम गंभीरतापूर्वक सोचें.. , तो इस प्रक्रिया में मृत्यु होती किसकी है..??

आध्यात्मिक कैलकुलेशन कहता है; “किसी की भी तो नहीं।”

समझिए!!

पृथ्वी,जल,अग्नि,आकाश,वायु

ये सभी तत्व अपनी अपनी जगह वापस ही, तो चले जाते हैं। मरता कौन है फिर मृत्यु किसकी हुई ..??।आप कहेंगे स्थूल शरीर की तो भई! वही तो पंचतत्व का बना हुआ था। उसी में समाहित हो गया।”

ईश्वर के विधान में स्थूल शरीर को हिंदू रीति से यदि अग्नि के हवाले किया जाता है,तो जलकर उसके पांचों तत्व “बैक टू पवेलियन” हो जाते हैं।

ठीक वैसे ही अन्य रीतियों से यदि जमीन में दबाने या दफनाने से भी वह खाके सुपुर्द हो कर पंचतत्व को ही प्राप्त हो जाता है।

लेकिन..लेकिन

मृत्युलोक में माया के वशीभूत इंसान ने अपनी व्यक्तिगत स्वार्थपरता के चश्मे से ऐसे मंजर को सदैव दुःखद रूप में ही देखा है।

मगर विद्वानों का एक सर्वे दुनियां के लोगों को तीन टुकड़ों में बांटकर देखता है।

नंबर एक “भौतिक जगत” की श्रेणी में आने वाले संसार के 80% लोग..अक्सर “माया” के प्रभाव में अपना जीवन जीते हैं। उनके लिए तो ये दु:खद ही है।

दूसरे नंबर “मानसिक जगत”..के जीव जो केवल 12% हैं वे मानसिक स्तर से अपनी जीविका को आगे बढ़ाते हैं।,

जबकि नंबर तीन “आत्मिक जगत” जो मात्र 8% ही है। वे सदैव आत्मा को सर्वोपरि मानकर ही प्रत्येक के साथ आचरण करते हैं।। ये श्रेणी स्थूलता के घटने /बढ़ने से कम ही विचलित होती है।

सामान्यतः किसी के स्थूल शरीर छोड़ने का समाचार सुनकर ..मानव मन का आहत हो जाना संभाव्य है..

लेकिन इस मृत्युलोक में आने के बाद इंसान की उचित सूझ बूझ, सदाचार उस अमुक जीवात्मा की भूमिका के अनुसार ही इंसान की पारिवारिक एवं सामाजिक छबि को आकार देते हैं, फिर वही पहचान संपर्क में आए लोगों के ज़हन में एक संस्मरण बन जाती है। जो बाद में ताउम्र वक्त वक्त पर उस अमुक व्यक्ति की याद दिलाने का फिनोमिना बनती है।

भारतीय सामाजिक व्यवस्था द्वारा गांव गांव शहर शहर प्रचिलित इन “शोक संतृप्त” (12/13) दिनों में लाज़मी है हमें उस अमुक जीवात्मा के सम्पूर्ण जीवन में से केवल उसके सकारात्मक कृतित्व पर एक सरसरी नज़र ..डालते हुए मौजूदा पीढ़ी के सामने,उसके बचपन, जवानी एवं वृद्धावस्था पर एक हैल्दी चर्चा-परिचर्चा.. कर लेनी चाहिए।

जीवात्मा प्राप्त “जीवन” को किस प्रकार की “ज़िंदगी” का आकार देने में कामयाब रही..?? ऐसे वक्त की बातें लोगों के लिए प्रेरणादायक या “Eye-Opener” का काम कर सकती हैं।

क्योंकि स्थूल शरीर से निकल कर जाने वाली प्रत्येक आत्मा.. हमारे लिए कई एक सवाल छोड़ जाती है। उदाहरण के तौर पर “रामायण” के एक निगेटिव चरित्र ‘रावण’ विद्वान एवं शक्तिशाली होने के बावजूद भी जीवन राह से भटक कर बहुत से आवश्यक कार्यों को अधूरे छोड़कर चला जाता है। जो इस बात का प्रतीक है कि हमें जीवन की राह पर चलते हुए भटकने से बचना होगा..और “समय एवं ऊर्जा” के रूप में प्राप्त अपनी प्रतिभा का उचित प्रयोग कर के अपना अध्यात्म स्तर बढ़ाना होगा।

दरअसल, पद्म पुराण के एक श्लोक ..के अनुसार..

“जलज नौ लक्षाणी, स्थावरा लक्ष विसंति,

कृमियां रुद्र संख्य काय।

दस लक्षाणि पक्षीणाम,

पशुणाम तीस लक्षाणी

चतुर लक्षाणी मानुष: ।।”

भावार्थ: आत्मा “नौ लाख” जलीय जीवों की योनियों में जन्म लेती है।, “बीस लाख” पेड़ पौधों की योनियों में।, “ग्यारह लाख” कीट पतंगों के रूप में..।, “दस लाख” पशुओं की योनियों में।, “तीस लाख” पक्षियों की योनियों में ये “अस्सी लाख” योनियां अन्य कही जाती हैं ।

..( तपहुं कर मानव तन पावा..) मनुष्यों की मात्र “चार लाख” योनियां ही होती हैं।

कहा जाता है सभी अस्सी लाख योनियों में कई एक जन्म लेने के उपरांत ही ये “मानव देह” प्राप्त होती है इसीलिए दुर्लभ कही गई है।

चौरासी लाख योनियों में कई एक बार जन्म मरण का विचरण करने के बाद आत्मा इस दुर्लभ “मानव देह” को प्राप्त कर लेने पर अपने आप को सफल मानती है।

उपरोक्त विवरण से विषय की गंभीरता को देखते हुए.. क्या आपको नहीं लगता!! “मनुष्य शरीर” में आने बाद एक बेहतर पारी खेली ही जानी चाहिए।

इसीलिए कर्मों से “भले लोग” बनिए…क्योंकि भले लोग “कभी नहीं मरते” वे अपनी अच्छाइयों से लोगों के मन मस्तिष्क में सदैव जिंदा रहते हैं।

धन्यवाद 🙏

विचारक ; योगेंद्र सिंह पचहरा, के एल जैन इंटर कॉलेज,सासनी,हाथरस।

(मूल निवासी : नीमगांव,राया,मथुरा)

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