239- प्रथम सीढ़ी

जी हां, अहंकार छोड़ने के बाद ही कोई कुछ सीख सकता है। हमें ज्ञान की प्रथम सीढ़ी को..अवश्य जान लेना चाहिए। क्योंकि धरती पर जन्म लेने के साथ ही सीखने की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है ज्यों ज्यों हम बड़े होते जाते हैं, सीखने की प्रक्रिया भी विस्तार लेने लगती है, जल्द ही हम उठना, बैठना, बोलना, चलना आदि सीखते चले जाते हैं। इस बड़े होने की प्रक्रिया के साथ ही जाने अनजाने में हमारा अहंकार भी हमसे कहीं अधिक बड़ा हो रहा होता है। और फिर हम सीखना छोड़.. गलतियां करने में लग जाते हैं।

यह अंहकार हमारे विकास मार्ग को अवरूद्ध कर देता है इस बात की चर्चा करते हुए मुझे एक वाकिया याद आ रहा है जिसकी चर्चा यहाँ करना शायद उचित ही होगा।

एक बार की बात है रूस के “ऑस्पेंस्की” नाम के महान विचारक एक बार संत “गुरजियफ” से मिलने उनके घर गए। दोनों में विभिन्न् विषयों पर चर्चा होने लगी।

ऑस्पेंस्की ने संत गुरजियफ से कहा, यूं तो मैंने गहन अध्ययन और अनुभव के द्वारा काफी ज्ञान अर्जित किया हुआ है, किन्तु गुरदेव ! मैं कुछ और भी जानना चाहता हूं। आप मेरी कुछ मदद कर सकते हैं..क्या..? गुरजियफ को मालूम था कि ऑस्पेंस्की अपने विषय के प्रकांड विद्वान हैं, जिसका उन्हें थोड़ा घमंड भी होने लगा है।

अतः सीधी बात करने से कोई काम नहीं बनेगा। इसलिए उन्होंने कुछ देर सोचने के बाद एक कोरा कागज उठाया और उसे ऑस्पेंस्की की ओर बढ़ाते हुए बोले- ”यह अच्छी बात है कि तुम कुछ सीखना चाहते हो। लेकिन मैं कैसे समझूं कि तुमने अब तक क्या-क्या सीख लिया है और क्या-क्या नहीं सीखा है। अतः तुम ऐसा करो कि जो कुछ भी जानते हो और जो नहीं जानते हो, उन दोनों के बारे में इस कागज पर लिख दो। जो तुम पहले से ही जानते हो उसके बारे में तो चर्चा करना व्यर्थ है और समय अभाव को देखते हुए जो तुम नहीं जानते, अब उस पर ही चर्चा करना उचित रहेगा।”

बात एकदम सरल थी, लेकिन ऑस्पेंस्की के लिए कुछ मुश्किल थी। अब तो उनका “ज्ञानी” होने का अभिमान धूल-धूसरित होने लगा.. ऑस्पेंस्की “आत्मा और परमात्मा” जैसे विषय के बारे में तो काफी कुछ जानते थे, लेकिन “तत्व-स्वरूप” और “भेद-अभेद” के बारे में उन्होंने कभी सोचा तक नहीं था।

गुरजियफ की बात सुनकर वे सोच में पड़ गए.. काफी देर सोचने के बाद भी जब उन्हें कुछ समझ में नहीं आया तो उन्होंने वह कोरा कागज ज्यों का त्यों गुरजियफ को थमा दिया और बोले- श्रीमान मैं तो कुछ भी नहीं जानता। मगर आज आपने मेरी आंखे खोल ही दीं।

ऑस्पेंस्की के विनम्रतापूर्वक कहे गए इन शब्दों से गुरजियफ बेहद प्रभावति हुए और बोले – ”ठीक है, अब तुमने जानने योग्य पहली बात को अच्छे से जान लिया है कि,” तुम कुछ नहीं जानते।” यही ज्ञानार्जन की “प्रथम सीढ़ी” है। अब तुम्हें अवश्य कुछ सिखाया और बताया जा सकता है। अर्थात खाली बर्तन को ठीक से भरा जा सकता है, किन्तु अहंकार से भरे बर्तन में बूंदभर ज्ञान भरना भी संभव नहीं होता।

हम “ज्ञान प्राप्त” के लिए ख़ुद को सदैव तैयार रखे, वही ज्ञानार्जन की पात्रता है। शायद यही ज्ञानी बनने का मूल मंत्र भी है कि, “मनुष्य ज्ञान पा लेने का संकल्प ले और वह न केवल किसी एक क्षेत्र से ही स्वयं को बांध ले, बल्कि उसे जहां कहीं.. और जिससे भी अच्छी बात पता चले, उसे अपने अंतःकरण में आत्मसात करने के साथ साथ जीवन के धरातल पर क्रियान्वित अवश्य किया करे।

धन्यवाद

; योगेंद्र सिंह पचहरा , नीमगांव

राधे गोविन्द

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