238- “देखा-देखी”

मुझे ऐसा लगता है कि, दुनियां में “देखा-देखी” के धरातल पर आधुनिकता की आड़ में सारी मर्यादाओं को ताक पै रखकर ..हाई पिच पर चल रही..एक अंधी दौड़ जिसे संत “रैट 🐀 रेसिंग” की संज्ञा दे ते हैं। इससे किसी भी तरह हमें बचना चाहिए। लेकिन ये बात..आसान नहीं है एक बहुत बड़ी चुनौती है..??

क्योंकि यही वो फिनोमिना है जिसके कारण जाने अनजाने में..लोग दु:ख एवं बीमारियों को खुद ब खुद निमंत्रण दे रहे हैं।

चलो! इसे एक घटना के हवाले से समझने का प्रयास करते हैं।

कुछ दिन पूर्व मेरे एक चिरपरिचित व्यक्ति द्वारा अपने शो रूम के उद्घाटन में मुझे आमंत्रित किया गया।

कार्यक्रम के बाद..उसने मुझसे कहा कि, भाई जी! हमारे शो रूम में विक्री के लिए छोटे बड़े लगभग ढाई हज़ार तरह के प्रोडक्ट हैं। आप उनमे से अपने इस्तेमाल के लिए कुछ प्रॉडक्ट चुन लीजिएगा,ताकि हम एक “गिफ्ट-पैक” बनाकर आपको भेंट कर सकें।

तब मेरे मन ने फ्रैंकली बोल दिया कि, महोदय! आप बुरा तो मानियेगा मत मुझे आपके शोरूम में रखी चीजों में से एक भी प्रोडक्ट व्यक्ति के “जीने के लिए बहुत जरूरी नहीं लगता” बल्कि मुझे तो इस बात का ताज्जुब हो रहा है कि आज का इंसान इन गैर जरूरी चीजों का प्रयोग आखिर करता ही क्यों है..?? मगर क्या कहें ये दुनियां है।

अब देखिए! और समझिएगा..

• एयर फ्रेशर के बिना क्या कभी किसी की सांस रुकी है।..??

• फेस वॉश इस्तेमाल न करने वालों में से कितनों के चेहरे काले हो गये हैं।

• होम थिएटर लगाकर कितने लोग कलाकार बन गए हैं..??

• क्या कंडीशनर लगाने वालों के बाल हमेशा काले रहते हैं

• क्या डाइनिंग पर खाने बालों के घुटने कभी नहीं दु:खते??

आप जरा ध्यान करके बताइएगा, कि हैंड वॉश के बिना किसके दादा,परदादा के पेट में कीड़े हो गए थे।

दरअसल,ये एक “देखा-देखी” का खेला है।

न जाने क्यों मुझे, तो ये “प्रकृति” को चुनौती देने जैसा लगता है।

वरना! आप ही बताइए!

• बगुला कौन सा शैंपू इस्तेमाल करता है जिससे सदैव इतना सफेद और चमकदार बना रहता है..?

• मोर अपने पंखों के रंगों को बचाने के लिए कौन सा प्रोडक्ट इस्तेमाल करता है..?

• क्या आपने कभी किसी जानवर के मोतियाबिंद होते सुना है..?

• क्या किसी खरगोश को कभी हेयर लॉस हुआ है..?

बताइए

• मधुमक्खी का शुगर लेवल बिना कोई प्रोडक्ट इस्तेमाल किए कैसे कंट्रोल रहता है..?

मुझे,तो ऐसा लगता है, इंसान का पैसा फिजूल खर्च कराके उसे दु:खी और बीमार बनाकर अपने मार्केट की कठपुतली बनाए रखने की, एक बहुत बड़ी साजिश है इन कंपनियों की और कुछ नहीं।

जैसे;

• नेट बंद,तो इंसान दु:खी।

• लाइट जाने पर… दु:खी।

• किसी इलेक्ट्रिक डिवाइस में अचानक कोई तकनीकी खराबी आ गई..तो दु:खी।

• केवल टी वी कट गया.. दु:खी।

• मच्छर मारने की दवा खत्म हुई,तो ..इंसान दुःखी।

• महिलाओं की मेक अप किट में कोई प्रोडक्ट खत्म होते ही ..मैडम भी दु:खी।

• और तो और कुछ लोग तो अपने कपड़ों की मैचिंग न मिल पाने पर भी दुःखी हो जाते हैं।

क्या आपको नहीं लगता.. आज के व्यक्ति को ‘दस मिनट में बीस’ तरह से दुःखी और परेशान होने की लत लग गई है।

पहले लोग,तो गुड या नमक रोटी खाकर..खुद के एक बाजू को तकिया बनाकर अपने सच्चे मित्र पेड़ पौधों की छांव में कहीं भी आराम से सो जाया करते थे।

लेकिन यहीं इसी धरा पर कुछ आध्यात्मिक लोगों के ऐसे “सादगी” वाले चरित्र भी हैं जिन्हें दुःखी करने के लिए..फरिस्तों को ख़ुद ही नीचे आना पड़ेगा। मैंने देखा है वे विकट परिस्थितियों में भी दुःखी नहीं होते!!

इसलिए, मैं फिर कहुंगा, कि ये सब सिर्फ एक “देखा-देखी” का खेला बना हुआ है,और कुछ नहीं। हो सके तो हमें इससे बचने का प्रयास करना चाहिए।

दुनियां की एक सच्चाई,ये भी है कि, “सुखी-रहने” के लिए बहुत कम खर्च लगता है।

दूसरों को “सुखी-दिखाने” के लिए.. कि “मैं कितना.. सुखी हूं..?” आपको नहीं लगता सारा खर्चा हम लोग इस पाखंड में करते रहते हैं।

जैसे-जैसे.. साइंस एंड टेक्नोलॉजी उन्नति के मार्ग पर अग्रसर होकर..हम इंसानों को सुविधा प्रदान करती जा रही है..यदि आपका नॉलेज विजडम में कन्वर्ट हो पाया हो, तो उसी उन्नति में इंसान के लिए दुःख के रास्ते खोलने वाले राज़ भी छुपे होते हैं। जो आपको स्पष्ट रूप से दिख जाते हैं।

यदि मेरा ये कैलकुलेशन किसी की समझ आ रहा है, तो फिर कहना न होगा कि, आप जागृत अवस्था में हैं। अन्यथा दुनियां की अस्सी फीसदी आबादी “भटकाव मोड” पर अपनी फिजूल खर्ची की लत में इस बहुमूल्य “जिंदगी” को जहन्नुम बना ले रही है।

क्यों न हम कर्मयोग के इस मूल मंत्र को आत्मसात करके..पहले कमाएं..और खर्च भी करें..परंतु “सुख की अनुभूति ” के लिए न कि “सुखी दिखने” के लिए..वैसे मुश्किल तो है मगर..

दुनियां में व्याप्त इस “देखा-देखी” के खेल से बचने का एक प्रयास कीजियेगा अवश्य।

धन्यवाद

योगेंद्र सिंह पचहरा,

मुखिया परिवार, नीमगांव से

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