230- व्यक्तित्व

चलो! आज थोड़ा पर्सनेलिटी अर्थात “व्यक्तित्व” जिसका मानव जीवन में खासा महत्व होता है। उसकी ओर मुखातिव होते हैं।

लोगों पर इसके ‘प्रभाव’ का असर देखते हैं कैसा होता है..??

हमारे आसपास की दुनिया में क्या हो रहा है यह,तो हम सब देख ही रहे हैं। आजकल मेरे ख्याल से सभी पर “अपना प्रभाव चलाना” लोगों के लिए यही दुनिया है।

मैं देख रहा हूं कि हर कोई इसी धुना बुनी में लगा रहता है।

एक और बात.. हमारी शक्ति का कुछ अंश तो हमारे शरीर धारण के उपयोग में अवश्य आ जाता है। और बाकी हमारी ऊर्जा का हर कण दिन रात दूसरों पर अपना प्रभाव डालने में या उसके प्रयास में नष्ट करता रहता है।

हमारा शरीर, हमारे गुण, हमारी बुद्धि तथा हमारा आत्मिक बल ये सब लगातार दूसरों पर प्रभाव डालते आ रहे हैं।

इसी प्रकार इसका उलट दूसरों का प्रभाव हम पर भी कुछ वैसे ही पड़ता चला आ रहा है।

हमारे आसपास यही चल रहा है।

अब हम एक स्कूल के दृष्टांत से इसे समझने का प्रयास करते हैं।

एक मनुष्य तुम्हारे पास आता है वह खूब पढ़ा लिखा है। उसकी भाषा भी सुंदर है वह तुमसे लगभग एक घंटा बात करता है, तो भी वह अपना असर तुम पर नहीं छोड़ पाता।

इसके बाद फिर एक दूसरा व्यक्ति आता है और वह सिर्फ कुछ गिने चुने शब्द बोलता है शायद वे व्याकरण सम्मत और भाषा में ठीक से व्यवस्थित भी नहीं हैं। फिर भी वह ऐसा असर छोड़ जाता है कि हम उसे भुलाए नहीं भूलते।

ये सब क्या है..??

ऐसा “सेंस एक्सपीरियंस” तो हम में से बहुतों ने कई एक बार महसूस किया होगा ..??

इससे स्पष्ट होता है कि मनुष्य पर जो प्रभाव पड़ता है वह सारा प्रभाव “शब्दों” का नहीं होता। और किसी के “विचार” भी हमें शायद एक तिहाई प्रभावित ही कर पाते हैं। शायद प्रभाव का एक तिहाई अंश ही उत्पन्न करते होंगे। परंतु वास्तविकता में शेष दो तिहाई प्रभाव तो “व्यक्तित्व” का ही होता है।

जिसे हम ‘वैयक्तिक चुंबकत्व’ भी कहते हैं। वही प्रकट होकर तुमको प्रभावित कर जाता है। आपने देखा ही होगा..हम लोगों के कुटुंब में मुखिया होते हैं इनमें से कोई कोई अपना घर चलाने में सफल होते हैं परंतु कोई-कोई नहीं भी होते हैं। ऐसा क्यों है..?? जब हमें असफलता मिलती है तो हम दूसरों को पूछते हैं ..ऐसा क्यों हुआ..?? ज्यों ही हमें असफलता मिली, त्यों ही हमने कहना शुरू कर दिया कि, अमुक अमुक मेरी असफलता के कारण है।

असफलता आने पर मनुष्य अपनी दुर्बलता तथा दोष को खुद स्वीकार करना नहीं चाहता। उस वक्त प्रत्येक मनुष्य यह दिखलाने की कोशिश करता है कि वह निर्दोष है। और वह अपना सारा दोष अपने कुटुंब के किसी और व्यक्ति/वस्तु पर अंततः भाग्य पर मढ़ना चाहता है।

जब घर का मुखिया असफल हो तो उसे स्वयं से पूछना चाहिए कि, “कुछ लोग अपना घर कैसे चलाते हैं..?? कुछ बहुत अच्छी तरह से चला सकते हैं और उस प्रकार दूसरे क्यों नहीं चला पाते..??

इसे गंभीरता पूर्वक समझेंगे तब तुम्हें पता चलेगा कि यह अंतर मनुष्य के ही कारण है। यानी उसकी उपस्थिति और उसके व्यक्तित्व के कारण है। यदि मानव जाति के बड़े-बड़े नेताओं की बात ली जाए तो हमें सदा यही दिखाई देगा कि उनका व्यक्तित्व ही उनके प्रभाव का कारण था। अब प्राचीन काल के महान लेखकों वह उनके विचारों को लो सच पूछो तो उन्होंने हमारे समक्ष कितने अच्छे और सच्चे विचार रखे, अतीतकालीन लोकनायकों की जो रचनाएं तथा पुस्तक आज हमें उपलब्ध है, उनमें से प्रत्येक का मूल्यांकन करें,तो कुछ मुट्ठी भर ही असल में नए एवं स्वतंत्र विचार हैं जो अभी तक इस संसार में सोचे गए हैं। उन लोगों ने जो विचार हमारे लिए छोड़े हैं,एक बार पुनः उनको उन्हीं की पुस्तकों में से पढ़ो तो वह हमें कोई दिग्गज नहीं प्रतीत होते। तथापि हम जानते हैं कि अपने समय में ही दिग्गज थे। इसका कारण क्या है वह जो बहुत बड़े प्रतीत होते थे। वह मात्र उनके सोचे हुए विचारों या उनकी लिखी हुई पुस्तकों के कारण नहीं था। और ना ही उनके दिए हुए भाषणों के कारण ही था। वह तो किसी और “बात” के ही कारण था, जो अब निकल गई है अब “वह” हमारे सामने मौजूद नहीं है। ‘वह’ अर्थात उनका “व्यक्तित्व” जैसा मैं पहले कह चुका हूं कि दो तिहाई अंश व्यक्तित्व होता है।और बाकी एक तिहाई अंश मनुष्य की बुद्धि और उसके कहे हुए शब्द होते हैं। सच्चा मनुष्य या उसका व्यक्तित्व ही वह वस्तु है जो हम पर प्रभाव डालते हैं। “कर्म” तो हमारे “व्यक्तित्व” की बाह्य अभिव्यक्ति मात्र है। व्यक्ति न होने पर कम तो होंगे ही कारण के रहते हुए कार्य का आविर्भाव अवश्यंभावी है।

सारी शिक्षा समस्त प्रशिक्षण का एकमेव उद्देश्य मनुष्य का सही निर्माण होना या मनुष्य में उचित गुणों का सृजन करना है। पर हम यह न करके केवल बहिरंग पर ही पानी चढ़ाने का प्रयत्न किया करते हैं। जहां व्यक्तित्व का ही अभाव है वहां सिर्फ बहिरंग पर पानी चढ़ाने का प्रयत्न करने से क्या लाभ..??

सारी शिक्षा का ध्येय है मनुष्य का चहुमुखी विकास करना। वह मनुष्य जो अपना प्रभाव सब पर डालता है। जो अपने संगी साथियों पर जादू सा कर देता है। मनुष्य “शक्ति” का एक महान केंद्र है। और जब उसमें ये मानवता रूपांतरित हो जाती हैं। तब वह जो चाहे कर सकता है।

“व्यक्तित्व” का महत्व समझिएगा!! .. कि “वह” जिस भी वस्तु पर अपना “प्रभाव” डालता है, उसी को क्रियाशील बना देता है।

धन्यवाद

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