जी, हां ऐसा ज्ञान जो तुलनात्मक नजरिए से दुनियां के समस्त ज्ञान में सुपर हो.. और आध्यात्मिक दृष्टि से ‘जीवात्मा’ के लिए परम आवश्यक भी हो ..तो क्या ऐसे वैचारिक ‘ज्ञान’ को सारे ज्ञानों का “मूल तत्व” नहीं कह दिया जाएगा..??
विचार की प्रादुर्भाव अवस्था का “मूल तत्व” अर्थात बीज…
न्याय की कसौटी भी कुछ इसी ओर इशारा करती है कि अवश्य “मूल तत्व” कहा जाना चाहिए। विषय थोड़ा पेचीदा अवश्य है।
मगर विद्वान कहते हैं कि ‘ किसी भी कीमत ‘ पर हम सबको इसे जानने के लिए..थोड़ा चिंतन करना होगा।
देश या अपने प्रदेश की “पाठ्यक्रम निर्धारण समिति” यदि ऐसे विषय को भारतीय शिक्षा प्रणाली में सम्मिलित कर सके, तो ये बड़ा सराहनीय कदम होगा।
हालांकि, समूचे विश्व में भारत ही एक ऐसा देश है जहां की पब्लिक अन्य देशों की तुलना में काफ़ी हद तक ‘सोल-कॉन्शियस’ अर्थात.. ‘आत्माभिमानी’ है।
क्या आपको नहीं लगता कि, औरों की तुलना में हम भारतीयों का इस तथ्य में फिर भी बहुत विश्वास है कि, हम महज़ “एक शरीर.. नहीं.. ‘आत्मा’ हैं।”
जबकि पश्चिमी देशों के लोगों में ‘बॉडी-कॉन्शियस’ का गुमान झलकता है। लेकिन वहां अब काफी परिवर्तन देखने में आ रहा है।
वास्तव में आंकलन किया जाए, तो समूची दुनियां में ‘देहाभिमानियों’ की जमात कहीं अधिक है। आंकड़े तो यहां तक कहते हैं कि, दुनियाँ की अस्सी फीसदी आबादी ‘डिग्रैस’ मोड पर है। कुल मिलाकर जिंदगी की असल राह से भटकी हुई है।
इस बात का अंदाजा आप ऐसी घटनाओं से लगा सकते हैं कि भारत में “यू पी एस सी” के थ्रू आई ए एस जैसी गंभीर परीक्षा क्रैक करने में प्रतियोगियों को बहुत ‘फोकस्ड’ होकर.. ऐड़ी चोटी का ज़ोर लगाने के बाद.. वर्षों से तैयारी कर रहे एस्पायरेंट में से मात्र दस प्रतिशत ही सलेक्शन ले पाते हैं। वे फिर अपने विभागीय लीडर के प्रेशर में आकर या पारिवारिक गृह क्लेश से तंग होकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ले, तो आप क्या कहेंगे..?? हैं।
जहां तक मैं सोच पा रहा हूं .. ऐसे लोगों में “भौतिकता की प्रचुरता एवं उनका आध्यात्म शून्य” होता होगा। जो उन्हें ऐसा करने को बाध्य करता है।
वरना! तनिक सोचिएगा.. समय से पूर्व खुद अपने स्थूल शरीर को नष्ट कर देने के बाद ..
क्या..उन्हें तुरंत दूसरा शरीर मिल जायेगा..? और मान लो.. मिल भी जाए, तो इस बात की क्या गारंटी है कि आप सूअर,कुत्ता,बंदर बगुला आदि नहीं..बनेंगे..फिर से मनुष्य ही बनोगे.. चलो ! मनुष्य बन भी गए.. क्या जिंदगी को उचित आकार देने के लिए फिर संघर्ष नहीं करना होगा..??
“जिन्दगी हर कदम एक नई जंग है..” वाले..दुनियां के इस दस्तूर से बच जायेंगे.. क्या..?? क्या वे ऐसा सोचते हैं कि वहां बहुत बड़ी अथॉरिटी आपका इंतजार कर रही होगी.? जो जाते ही पदासीन हो जाओगे..??
मांफ कीजिएगा.. इन मूल प्रश्नों का ख्याल न आना ही उनकी “आध्यात्मिक शून्यता” को दर्शाता है।
लेकिन ये बात भी अपनी जगह सही है कि अब दुनियां में स्वत: ही एक ऐसा दौर चल पड़ा है कि लोग अध्यात्म की ओर आने लगे हैं..और कुछ कुछ समझने भी लगे हैं।
इसीलिए कई बार लोगों के मन में अक्सर एक जिज्ञासा उत्पन्न होती है..
और वो जिज्ञासा कुछ इस तरह के सवालों को जन्म देती है..जैसे;
“जब मां के गर्भ में शिशु के स्थूल शरीर को आकार मिल रहा होता है, तो क्या उस वक्त.. शिशु के शरीर में ‘आत्मा’ होती है..” ??
ये प्रश्न ऐसा है कि इसका रहस्य ठीक से समझ आ जाए, तो मानव जीवन की बहुत सी अनसुलझी गुत्थियां सुलझ सकती हैं।
वर्षों पहले..लोगों के कुछ ऐसे पेचीदा सवालों को सुनने के बाद ही मेरे मन में भारतीय शास्त्रों व श्रीमद्भागवत गीता जैसे महान ग्रंथों का, अध्ययन करने की जिज्ञासा पैदा हुई थी।
जो मैंने अध्ययन के दौरान पाया कि शास्त्रों के अंदर जो ज्ञान है वह वाकई अदभुत है। सारे ज्ञानों का “मूल तत्व” है। उसके आधार पर ही मैं ऐसे जटिल मुद्दे पर एक लेख लिखने की हिमांकत कर रहा हूं।
वरना मेरी क्या बिसात है ऐसे गहन मुद्दों पर कुछ भी कह पाने की।..
श्रीमद्भागवत में श्रीकृष्ण कहते हैं, “ममे माक्ष जीव लोके..अर्थात आत्मा” जो ईश्वर का अंश है। मृत्युलोक में आने पर गीता में ‘आत्मा की जर्नी’ अर्थात यात्रा के कुछ गहरे तथ्यों से पर्दा उठाते हुए.. भगवन हमें बता रहे हैं..
यहां मैं एक और बात स्पष्ट करना चाहूंगा कि, ये आत्मा जब ईश्वरीय अंश है,तो फिर ये दुनियां बिच आती ही क्यों है..??
शास्त्रों में उल्लिखित आत्मा के मृत्युलोक में आने के उद्देश्य को जानकर एकबार को तो आप भी चकित रह जायेंगे….
मगर ईश्वर की सर्वोत्तम रचना कहे जाने वाला मनुष्य अपने जीवन के अमूल्य पलों को आज ‘स्ट्रेस’ में जी.. रहा है। हो सकता है.. उसे इस वृतांत से काफ़ी रिलैक्स महसूस हो।
शास्त्रों के अनुसार “जीवात्मा” अपने द्वारा किए गए कई एक जन्मों के संचित कर्मों में..से चुने गए कुछ खास कर्मों से निर्मित “प्रारब्ध” के वशीभूत दुनियां में अपनी आनंद-वृत्ति (एंजॉयिंग प्रोपेंसिटी) के लिए आती है।
गीता में स्पष्ट कहा गया है कि, “मां के गर्भ धारण करने के बाद ‘डे वन’ से ही आत्मा शिशु के अंदर मौजूद हो जाती है।
जबकि.. अमेरिका जैसे एडवांस देश में एक लंबे अर्से तक लोगों में ये धारणा बनी रही कि “सातवें महीने के बाद शिशु में आत्मा आती है..”
फिर बाद में मेडिकल साइंस ने भी अपना पक्ष रखते हुए कहा, कि “गर्भ में भ्रूण लगभग तीन महीने तक जस्ट ‘अ लोफ ऑफ़ फ्लैश’ यानी केवल “एक मांस का लोथड़ा” होता है।”
मां के गर्भ में शिशु के मूवमेंट करने पर फिर मेडिकल साइंस ने कुछ और अपडेट्स दिए..तब कहा, कि ये ही वो वक्त है जब “शिशु के अंदर आत्मा” आती है।
इसीलिए चिकित्सक लोग तीन-चार महीने के पीरियड तक बेचारी महिलाओं का एवोर्सन करके जाने अंजाने में भ्रूण हत्याएं करते रहे..
जबकि हमारे शास्त्रों व भगवतगीता में हजारों वर्ष पहले से.. स्पष्ट लिखा हुआ कि शिशु में पहले दिन से ही आत्मा विद्यमान रहती है।
शेष अध्ययन जारी है.. वक्त के अधीन अभी “मूल तत्व” पर रिसर्च चल रही है..
धन्यवाद