यदि आप आत्मिक स्तर पर जागृत हैं, तो आप कदम कदम पर देख ही रहे होंगे कि न केवल लोकतंत्र पर हमला है बल्कि देश के कई बड़े संस्थानों पर योजना बंद तरीके से निरंतर हमले किए जा रहे हैं। आप समझ रहे होंगे कि यह ब्लैक इंडियन लीडर्स न केवल रंग के काले हैं बल्कि मन के भी बेहद काले हैं। सेवा के पदों पर कई कई पेंशन व मोटे वेतन पेट्रोल, मोबाइल,फॉरेन ट्रिप आदि के लिए भत्ते अपने आप ही बढ़ा लेने की व्यवस्थाएं निश्चित कर रखी हैं।
सिर्फ जन्म से भारतीय कहे जाने वाले इन नेताओं और उन फिरंगियों में कोई अधिक अंतर नहीं है। इन्होंने भी देश पर निरद्वंद शासन करते रहने के लिए देश की भोली भाली जनता को जाति/धर्मों में इस कदर बांट रखा है कि, सारा खेल समझने के बावजूद भी जनता इनके खिलाफ़ एक जुट नहीं हो पाती। क्योंकि ये नेता अपनी फरेब की कुर्सी को बचाए रखने के लिए दिन प्रतिदिन लोगों के बीच नफ़रत फैलाने में बहुत माहिर होते हैं।
इन्हीं के द्वारा व्याप्त महंगाई की मार से त्रस्त होने से..कुछ असहनीय परेशानियों के कारण जनता अब काफी संवेदनहीन होती जा रही हैं।
आपने एक बोध कथा पढ़ी होगी कि अगर एक मेंढक को उबलते हुए पानी में डाला जाए तो वह तुरंत उछल कर बाहर निकल आता है।
लेकिन यदि वही मेंढक पहले सामान्य पानी में डाला जाए फिर उस पानी के नीचे धीरे-धीरे आग जलाई जाती रहे..तो वह मेंढक बाहर नहीं निकलेगा क्योंकि पानी का ताप धीरे-धीरे एक एक डिग्री सेंटीग्रेड बढ़ने से मेडक को ताप सहने की आदत होती जाएगी..और एक दिन ऐसी स्थिति आएगी कि वह मर भी जाए। मगर छटपटाहट के साथ बाहर आने की जहमत नहीं उठा पायेगा।
इसे दूसरे शब्दों में हम ऐसे भी कह सकते हैं कि मेडक में छटपटाने की सामर्थ्य ही नहीं बचेगी। वह दिन प्रतिदिन बदलती उस स्थिति को अपने जीवन की नियति मानकर ताप सहता हुआ दुनियां से चला जायेगा।
यदि आप देश दुनियां के करेंट अफेयर्स पर अपनी पैनी नज़र रखते हैं,तो दुनियांभर के नेताओं के ऐसे बर्ताव से अच्छी तरह से वाकिफ होगे।
शायद ऐसी ही विकट परिस्थिति पर किसी कवि की ये रचना भी यहां काफी सटीक बैठती है कि, “दर्द सहने की इस कदर आदत सी हो गई है.. दर्द होता है.. मगर होता नहीं है।”
अर्थात आज जनता भी ठीक वैसे ही अपने दर्द की अनुभूति नहीं कर पा रही है। और यदि कर भी रही है,तो उसे लगता है कि ऐसा, तो सभी के साथ होता है।
अब कुछ वैसी ही स्थिति में दुनियाभर की जनता पड़ी हुई है।
जिस प्रकार मेंढक के लिए एक-एक डिग्री टेंपरेचर प्रतिदिन बढ़ाया जाता रहा है ठीक वैसे ही ये सरकारें भी जनता के लिए आए दिन सिकंजे कसती ही चली जा रही हैं। इसे आप किसी भी संदर्भ में देख और समझ सकते हैं..चाहे बेरोजगारी की बात हो या अनलिमिटेड टैक्स, स्वास्थ्य , शिक्षा या फिर और किसी संदर्भ में..
हमारे कुछ राजनीतिक विश्लेषक कभी-कभी ऐसा कहते हैं कि 2024 का चुनाव देश का आखिरी चुनाव हो सकता है। अर्थात अब चुनाव ही नहीं हुआ करेंगे।
मैं उन साथियों से बिल्कुल सहमत नहीं हूं। ठीक है। वह सही हो भी सकते हैं मगर मेरी नजर में यह लोकतंत्र की हत्या का बीसवीं सदी का बहुत ही प्राचीन मॉडल है।
जबकि कि हम अब इक्कीसवीं सदी में हैं, इसलिए किसी भी चीज़ की हत्या करने का मॉडल ही पुराना क्यों होगा। इस नए मॉडल में चुनाव आदि प्रक्रिया काफी नियमित वह व्यवस्थित तरीके से ही कराई जाएंगी।
लेकिन चुनाव में सत्ताधारी दल की विजय जरूर सुनिश्चित रहेगी।
आप ध्यान करें बीसवीं सदी टाइप नेता टीवी पर समाचार पत्रों में रेडियो आदि के माध्यम से सूचनाएं देते थे कि, कल से मार्शल लॉ लगा दिया गया है।, सेंसरशिप हो गई है इसलिए आप देश में ये..नहीं कर सकते वो..नहीं कर सकते। अर्थात आपकी फ्रीडम खत्म हो गई है वगैरा-वगैरा.. जैसे ; उदाहरण के तौर पर इंदिरा गांधी ने 1975 में इमरजेंसी के दौरान किया था, बांग्लादेश व पाकिस्तान में हुआ था, अफ्रीका महाद्वीप के पचासों देशो में भी ऐसा ही हुआ था। यह खुले तौर पर लोकतंत्र की हत्या के मॉडल की नजीर हैं।
मगर अब इक्कीसवीं सदी आते-आते दुनिया भर के तानाशाह (डिक्टेटर) भी समझदार हो गए हैं। वे भी जान गए हैं कि, अब सारी..जनता बेहोश नहीं है। कुछ लोग जागृत भी हो गए हैं। आप जानते हो कि, खुले तौर पर हत्या करने से खून हाथ में लग जाता है वह गंदा लगता है..उसे देखकर भोली भाली बेहोश पड़ी जनता कहीं जाग्रत न हो जाए। जिससे क्रांति के हालात तैयार जाएं। इसलिए वे ऐसा नहीं करते। वैसे उसकी अब कोई आवश्यकता भी नहीं है।
आज देश दुनिया में अनेकों मॉडर्न तकनीक विकसित हो चुकी है। फिर हाथ गंदे ही क्यों किए जाएं ??
इसलिए इक्कीसवीं सदी का मॉडल है कि, जो लोकतंत्र की हत्या करता है। वह सबसे पहले जनता का गुणगान करता है वह कहता है कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र हमारा.. है। हम लोकतंत्र के जनक हैं। फिर जनता जनार्दन की जय बोलता है। और उसके बाद चाकू लेकर एक इंच का कट लगा देता है। फिर अगले दिन मंत्र पढ़े जाते हैं.. संसद की जय हो नई संसद नई इमारत, नई इबारत.. बगैरा.. वगैरा। फिर एक इंच काट देता है। फिर एक दिन कहता है कि, मीडिया की स्वतंत्रता बहुत अनिवार्य है। मीडिया को अपनी जिम्मेवारी निभानी चाहिए। उसके बाद एक इंच और काट देता है।
इस तरह धीरे धीरे काटकर और बांटकर हत्या करने का ये इक्कीसवीं सदी का नया मॉडल है।
ये केवल भारत में ही नहीं रूस में पुतिन कर रहा है, तुर्की में एरदोगिन कर रहा है, हंगरी में औरवाम जो कर रहा है। ये हत्या के बिल्कुल टेक्स्ट मॉडल है। ये मेरा मनगढ़ंत विचार नहीं है। इन षड्यंत्रों को उजागर करने के लिए एक पुस्तक भी प्रकाशित कर दी गई है। जिसका नाम है “हाऊ टू किल डेमोक्रेसी” ये दुनियां की वास्तविक तश्वीर से रुबरू कराती ‘पुस्तक’ आज मार्केट में उपलब्ध है।
यद्यपि उसमें किसी के नाम का उल्लेख तो नहीं किया गया है। लेकिन उस पुस्तक को जब आप पढेंगे,तो लगेगा कि ये सारे घटनाक्रम आपके ही इर्द गिर्द घटते चले जा रहे हैं।
पढ़ने के लिए धन्यवाद
जागो भाई.. जागो..