अपने हिंदी प्रेमी पाठकों की मांग पर.. “God-habitancy” article का हिंदी वर्जन।
“God habitancy” अर्थात “ईश्वर का वास” That is a complicated question..
“Where does The God live..?”
एक बार की बात है कि सृष्टि के शुरू में ईश्वर ने सभी देवी देवताओं की एक सभा बुलाई और पूछा, कि आप सभी बताइए! कि जब दुनियां में ये विधान निश्चित है कि प्रत्येक ‘जीवात्मा’ अपने संचित कर्म संस्कारों के आधार पर बने प्रारब्ध के अनुरूप मृत्युलोक में न केवल जन्म लेती है बल्कि अपने पूर्व और वर्तमान जन्म में किए कर्मों के बाबत मिला, उनका ‘जीवन’ वैसी ही जिंदगी का आकार लेता है,जो उनके पूर्व संचित कर्म संस्कारों, देशकाल परिस्थितियों के गणित के अनुरूप.. हमारी “पूर्व निर्धारण व्यवस्था” जिससे दुनियां संचालित होती है। उसमें नियत हो चुका होता है। वही उनकी ‘ नियति ‘ बन जाता हैं।
फिर भी सांसारिक जीवधारियों में सबसे श्रेष्ठ..
‘मनुष्य-आत्मा’ जीवन में आने वाले उतार-चढ़ावों से अधीर होकर.. मुझे पुकारते हुए.. मेरे प्रतीक चित्रों के सम्मुख अपने दुखड़े रोने लगते हैं।
जिससे मेरी साधना में विघ्न होता है।
अब आप सभी बताइएगा.. मैं, (ईश्वर) आखिर कहां रहूं..?? जिससे अपनी दैनिक साधना व दुनियां के अग्रिम कार्यों को अंजाम दे सकूं..??
इस पर गणेश जी ने उनके प्रश्न का सम्मान रखते हुए कहा, हे भगवन! आप हिमालय की चोटी पर जाकर रहने.. लग जाइए।
भगवन बोले कि हिमालय की चोटी मनुष्य की पहुंच से कितने दिन तक दूर रह सकेगी..??
इंद्रदेव बोले, तो फिर आप महासागर में चले जाइए.. ना!
तभी वरुण देव ने परामर्श किया, “भगवन क्यों न आप अंतरिक्ष में जाकर रहने लगें..
उचित परामर्श के अभाव में ईश्वर एक पल थोड़ा निराश हुए.. वे समझ नहीं पा रहे थे.. कि आखिर, मैं,अब क्या करूं..??
जब ये मंजर सूर्यदेव ने देखा, तो वे बोले,
हे कृपानिधान! आप एक काम कर सकते हैं कि, क्यों न “आप प्रत्येक जीवात्मा के ह्रदय में ही बैठ जाएं..
तब वे आपको पूरी दुनियां में ढूंढते फिरेंगे और आप शांति पूर्वक उन्हीं के “ह्रदय” रूपी मंदिर में सदैव वास करते रहेंगे।
आगे सूर्यदेव ने अपनी तार्किकता के आधार पर सुझाया, मृत्युलोक में आध्यात्मिक श्रेष्ठजन “जीवात्मा” के उद्धार हेतु ज्ञान प्रसार करते हुए मूल मंत्र बताते हैं कि, “सांसारिक जीवन हमेशा ‘मन, बुद्धि और विवेक’ के सही संश्लेषण से चलता है।”
मगर, ये कटु सत्य भी किसी से छुपा नहीं है कि, मन की “चंचलता” और बुद्धि के “भरमाने” की प्रकृति सांसारी मनुष्य के लिए इतनी बड़ी चुनौती है, कि इससे पार पाना हर किसी के बस की बात तो है नहीं..??
हां, कुछ जाग्रत मनुष्य आत्माएं..बड़े प्रयासों से आसक्ति से उभरकर स्वयं को अनासक्ति के दायरे में लाकर.. बहुत अभ्यास के बाद “मन – बुद्धि” को नियंत्रित कर सांसारिकता से ऊपर उठकर जब चेतन्य हो जाती हैं.. तो फिर वे केवल अपने “विवेक” से निर्देशित होने लगती हैं।
लेकिन समस्त ब्रह्माण्ड में ऐसी श्रेष्ठ आत्माएं होती कितनी हैं..?? कइयों में कोई और करोड़ों में कोई एक या दो!!
भगवन ने कहा! सूर्यदेव जी सही कह रहे हो।
सूर्यदेव ने फिर कहा!, हे भगवन तभी उच्च भाव की स्थिति में “वे (आत्मा) आपको और आप (परमात्मा) उनको सहज भाव से पा जाओगे।
फिर कैसा विघ्न..??
जब आत्मा/परमात्मा का “एकत्व” हो जाए.. अर्थात संसारी आत्मा केवल्य को प्राप्त करने में सफल होकर आप में समाहित हो जाएं.. मानव योनी जो विद्वानों द्वारा “मोक्ष का द्वार” कही जाती है। उसे पालेंगे.. आख़िर यही जीवन का उद्देश्य है।
“संसारी जीवन” के लिए मोक्ष के मार्ग की राह भी तो कुछ इसी तरह बनती है ..??
इसलिए.. हे भगवन ! मेरे विचार से आप के लिए ‘उचित वास’ “जीव के ह्रदय” से अलग कहीं हो ही नहीं सकता। और ये दोनों के हित में भी रहेगा।
ईश्वर को सूर्यदेव का ये सारा तार्किक वृतांत बखूबी समझ आ गया..
वे स्वीकारते हुए बोले! “हां, सूर्यदेव आपकी बात में तथ्य है। वाकई! मेरे लिए उनके ह्रदय से उचित स्थान कहीं हो ही नहीं सकता।”
तब से ईश्वर (परम सत्ता) मनुष्य आत्मा के ह्रदय में विराजमान हैं..
अब विडंबना देखिए!! भौतिक दृष्टि वाले लोग उन्हें पृथ्वी,आकाश, पाताल, ऊपर-नीचे हर जगह ढूंढते फिरते हैं… मगर वे प्रभु को नहीं ढूंढ पा रहे हैं। इस प्रक्रिया से भला कभी ढूंढ भी पाएंगे..??
क्या आपको भी ऐसा ही लगता है..?? खैर..जो भी है।
दरअसल, यही है.. “God-habitancy” का राज.. अर्थात “ईश्वर के वास” का असल तथ्य..इस विचार को पढ़ने वाले महानुभाव को ह्रदय तल से मेरा धन्यवाद 👍
विचारक ; योगेंद्र सिंह पचहरा पौत्र श्री साहब सिंह मुखिया जी नीमगांव,राया,मथुरा से.. )
Your thoughts are true🙏👍
LikeLike
Good
LikeLiked by 1 person