217- खुशफहमी

जाहिर सी बात है कि, आज के मशीनी युग में कंप्यूटरीकृत साधनों के बीच लोगों के काम करने का तरीका काफी आसान हुआ है। जिससे अब शारीरिक परिश्रम भी कम करना होता है।

मगर अपनी ‘जीभ के स्वाद’ के हाथों मजबूर इंसान ने अपने खानपान में कोई बदलाव नहीं किए हैं, फिजिकल लेबर कम होने से आज हम लोगों के शरीर की चर्बी बढ़ रही है। जो आगे चलकर बीमारियों का सबब बन सकती है।

दूसरे हम काफी समय तक ‘ओबेसिटी’ को अपनी हेल्थ मानकर स्वस्थ होने की “खुशफहामी” में रह रहे होते हैं। जो गलत है।

जब तक कि हमारे अंदर कोई बीमारी विकराल रूप नहीं ले लेती। तब तक हम क्या कोई भी भला मानुष ये मानने को राजी नहीं होता।

ठीक उसी प्रकार भौतिकता की चकाचौंद में मानव-जीवन की राह से भटके हुए “भौतिक जगत” में तल्लीन रहने वाले अस्सी प्रतिशत लोग बेवजह की “Rat-racing” में फेयर & फाउल का गेम खेलते खिलते अपनी आय के साधन सेट हो जाने पर लोगों के सामने “खुशहाल” दिखने की शोइंग ऑफ़ एक्टिंग में इतने गहरे उतर जाते हैं कि उनके अपने भी कन्फ्यूज हो जाते हैं कि सच क्या है।

जबकि, समूचा विश्व जानता है, कि जीवन में खुशहाली,प्रसन्नता,आनंद एवं मन के सुकून का ‘आर्थिक सम्पन्नता’ से कभी कोई सरोकार होता नहीं है।

क्योंकि, लोगों की खुशहाली से रिलेटिड चाहे आप मेरे ब्लॉग 38 “अ रिसर्च रिपोर्ट ऑफ़ हार्वर्ड यूनिवर्सिटी” पढ़ लें या वर्ल्ड “हैप्पीनेस” इंडेक्स के उन सभी छह मानकों की गहन स्टडी कर लें, जो मनुष्य के ‘ नियंत्रित मन ‘ के साथ-साथ ‘ जीवन में एक संतुलन ‘ अर्थात जीवन में “अनुशासन” के महत्व की ओर इशारा करते हैं।

आप ताज़्जुब कर जायेंगे कि, उनके अनुसार व्यक्ति की प्रसन्नता में जीवन की सिर्फ मूलभूत आवश्यकताएं मैटर करती हैं। ‘आर्थिक सम्पन्नता’ का तो व्यक्ति के जीवन की खुशहाली से कोई खास ताल्लुक न पहले कभी रहा है न अब है,और न भविष्य में कभी रहेगा।

हां, इस बाबत प्रसन्नता के मानकों को गंभीरता पूर्वक समझने हेतु आपको नंबर फाइव पर.. 12 नवंबर, 2019 में पब्लिश हुआ “प्रसन्नता” नामक लेख एकबार पुनः देखना होगा।

धन्यवाद

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