An English poet Mr.Thomas Carew has also expressed his rational views on this topic by his poem “The true beauty”.
वैचारिक सुंदरता ही सच्ची सुंदरता होती है। अर्थात दुनियां में आरंभ से ही वैचारिक सुंदरता vs शारीरिक सुंदरता की एक रेस जैसी होती रही है..
एक कहानी के ज़रिए देखते हैं कि, आख़िर “विजयश्री” किसके हिस्से आती है..
विशेषत: आपकी जानकारी के लिए बता दूं ये कहानी भी एक सच्ची घटना पर आधारित है। सीन वहां से शुरू होता है.. कि एकबार शारीरिक रूप से काफ़ी सुन्दर सी एक महिला ने प्लेन में एंट्री ली.. और वह अपने स्टाइलिश अंदाज़ में सीट की तलाश के लिए उसने प्लेन में चारों ओर अपनी नज़रें घुमाईं।
उसने देखा कि उसकी सीट एक ऐसे व्यक्ति के बगल में है। जिसके दोनों हाथ ही नहीं है। शायद उस मनचली महिला को उस अपाहिज व्यक्ति के पास बैठने में अपनी बेइज्जती लगी होगी।
अक्ल की दुश्मन लेकिन ईश्वर प्रदत्त (गॉड गिफ्टिड) शक्ल की ‘सुंदर’ महिला ने तुरंत एयरहोस्टेस से बोला
“मै इस सीट पर सुविधापूर्वक यात्रा नहीं कर पाऊँगी।
आदतन उस नाटकीय महिला ने एयरहोस्टेस से सीट बदलने हेतु आग्रह किया।
असहज हुई एयरहोस्टेस ने पूछा, “मैम क्या आप मुझे इसका कारण बता सकती हो..?”
शारीरिक सौंदर्य से दिखावटी उस महिला ने बेहद बेतुका जवाब दिया, कि “मैं ऐसे लोगों को पसंद नहीं करती। ऐसे व्यक्ति के पास बैठकर मैं यात्रा नहीं कर पाउंगी।”
कागज़ी पढ़ाई वालों के..ही ऐसे तौर तरीके होते हैं। क्योंकि यथार्थ जीवन में व्यावहारिक तौर पर उसका रवैया ठीक नहीं था।
उस महिला की यह बात सुनकर एयरहोस्टेस अचंभित हो गई।
महिला ने एक बार फिर एयरहोस्टेस से जोर देकर कहा, कि “मैं उस सीट पर नहीं बैठ सकती। अतः मुझे कोई दूसरी सीट दे दी जीए ना..!!”
एयरहोस्टेस ने खाली सीट की तलाश में चारों ओर देखा पर कोई सीट खाली न दिखी।
एयरहोस्टेस ने महिला से कहा कि “मैडम इस इकोनोमी क्लास में कोई सीट खाली नहीं है, किन्तु यात्रियों की सुविधा का ध्यान रखना हमारा दायित्व है।
अतः मैं विमान के कप्तान से बात करती हूँ। कृपया तब तक थोडा धैर्य रखिए।” ऐसा कहकर होस्टेस प्लेन के कप्तान से बात करने चली जाती है।
कुछ समय बाद लोटने पर उसने महिला को बताया, “मैडम! आपको जो असुविधा हुई, उसके लिए बहुत खेद है। इस पूरे विमान में, केवल एक सीट खाली है..मगर वह प्रथम श्रेणी में है।
मैंने हमारी टीम से बात की और हमने एक असाधारण निर्णय लिया है। क्योंकि एक यात्री को इकोनॉमी क्लास से प्रथम श्रेणी में भेजने का कार्य हमारी कंपनी के इतिहास में पहली बार हो रहा है।”
ये सुन.. वह आडंबरी नारी अत्यंत प्रसन्न हुई, किन्तु इसके पहले कि वह अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करती..या और एक शब्द बोल पाती…
एयरहोस्टेस दौनों हाथों से असहाय व्यक्ति की ओर बढ़ गई और विनम्रता पूर्वक उनसे आग्रह किया..
“सर, क्या आप हमारे साथ प्रथम श्रेणी तक जा सकेंगे..? क्योंकि हम नहीं चाहते कि आप जैसा महान व्यक्तित्व अनकंफर्टेबल फील करें और परेशान हों।
यह बात सुनकर सभी यात्रियों ने ताली बजाकर प्लेन के कप्तान के इस निर्णय का स्वागत किया।
दरअसल, वाहिय रूप से सुन्दर दिखने वाले लोग कई बार दिली तौर पर बहुत निम्न सोच वाले निकलते हैं।
तब उस अपाहिज व्यक्ति ने खड़े होकर कहा, मेरे यात्री साथियों !
मेरा एक छोटा सा परिचय ये है कि, “मैं एक भूतपूर्व सैनिक हूँ। दुर्भाग्य से मैंने एक ऑपरेशन के दौरान कश्मीर सीमा पर हुए एक बम विस्फोट में अपने दोनों हाथ गंवा दिए..थे। सबसे पहले, जब मैंने इन देवी जी की परेशानी सुनी, तब मेरा मन बरबस सोच रहा था। कि मैंने भी किन लोगों की सुरक्षा के लिए अपनी जान जोखिम में डाली थी, कैसे हैं मेरे देश के नागरिक?? जिनके लिए मैंने अपने हाथ खो दिए..??
लेकिन जब आप सभी की प्रतिक्रिया देखी.. तो अब अपने आप पर मुझे गर्व हो रहा है कि मैंने अपने देश और अच्छे देशवासियों के लिए अपने दोनों हाथ खोये हैं, अब कोई गिला नहीं।” और इतना कह कर, वह फरिश्ता प्रथम श्रेणी में बैठने चला गया।
शारीरिक सौंदर्य पर पागल महिला आज वैचारिक व मानसिक सुंदरता के सामने पूरी तरह से पराजित और अपमानित होकर अपना सिर झुकाए सीट पर अकेली बैठी रही ।
मेरा ख्याल भी यही है कि, किसी मनुष्य के अगर विचारों में एंपैथी व सिंपैथी अर्थात उदारता नहीं झलकती है, तो इतिहास साक्षी है..ऐसी ‘वाह्य सुंदरता’ को दुनियां की “इंटेलेचुअल-लॉबी” ने सदैव नकारा है।
धन्यवाद
विचारक ; योगेंद्र सिंह पचहरा
जैन इंटर कॉलेज,सासनी,हाथरस