215 – पत्नी

पत्नी अर्थात “जीवन संगिनी” इस मृत्युलोक की जीवनयात्रा का एक “सच्चा और वफादार” साथी यानी हमसफ़र..जो व्यक्ति के साथ बेहतरीन दोस्तों की फेहरिस्त में नंबर वन के पायदान पर सदैव आत्मीय होता है।

मेरे विचार से तो “पत्नी” को शब्दों में कवर करना लगभग असंभव है। ये अल्फाज काफ़ी गहरा है।

दरअसल, ये मानव जीवन का एक कटु सत्य है। जिसे व्यक्ति किन्हीं कारणों वश दूरी बनने पर..या दुर्भाग्य से “अकेला” हो जाने पर जितना समझ पाता है। मौजूदगी में इस शब्द को तवज्जो ज़रा कम ही देता है।

ये घटना एकदम सामान्य है गृहस्थ जीवन में ऐसा कई एक लोगों के साथ होता है। मगर मेरे लिए अब ये एक बेहतरीन संस्मरण ही है।

हां मेरा ये अनुभव जजवाती लोगों के लिए शिक्षाप्रद भी हो सकता है।

बड़े बुजुर्ग सदैव कहते आए हैं कि,जब घर में चार वर्तन होते हैं, तो आपस में थोड़ा.. बहुत खनकते ही हैं ..

इसीलिए परिवारिक मामलों में किसी भी बात को लेकर ज्यादा माइंड करना कभी उचित नहीं माना गया है।

जीवन में सुकून से रहना हो, तो अमुक बात को “समय की बलिहारी” पर छोड़ देना चाहिए।

  इसी श्रंखला में..  डाइनिंग हॉल में “घर परिवार” से संबंधित टेबल टॉक जो हर घर में एक सामान्य सी बात है। एक बार किसी बात पर बाई द वे मेरा पत्नी जी से डिस्कस शुरू हो गया ! धीरे धीरे बात थोड़ी बढ़ने लगी, खतरेको भांपते हुए फिर मैं ही रणछोर बन .. कुछ बड़बड़ाते हुए नाराजी के अंदाज़ में.. घर से बाहर निकल लिया..खाने के बाद थोड़ा बहुत चहल-कदमी के लिए अक्सर मैं जाता ही था..तो ऐसा करना उनके लिए असहज नहीं था।

बाहर आकर ज़रा सोचा! और सबक भी लिया.. कि, “आज पढ़ी लिखी तर्कशील महिलाओं से केवल सेफ मुद्दों पर ही डिस्कसन करना उचित है,किसी सेंसटिव मुद्दे पर नहीं। “

   पता नहीं, ये नारियां इतनी वाकपटु होती क्यों हैं..??

मौका मिलते ही इनके लैक्चर…शुरू हो जाते हैं। उस वक्त उनके सुनने की सामर्थ्य जानें कहां चली जाती है।

मैंने जाते ही,कॉलोनी की कैंटीन में चाय ऑर्डर की और सामने पड़ी चेयर पर बैठकर कुछ सोच ही रहा था, कि.. तभी पीछे से एक परिचित सी आवाज कानों को सुनाई दी,

“इतनी सर्दी में घर से ‘बाहर’ चाय पी रहे हो..? युग पुत्तर! अज की गल ए ..??

गर्दन घुमा कर देखा तो पीछे की चेयर पर बैठे मेरे एक पड़ोसी,पिता तुल्य बुजुर्ग सरदार जी थे। प्रति उत्तर में मैनू भी बोल दिया,अंकल दी ग्रेट!आप भी तो, इत्थे ही हो..?? आप भी इस टैम घर में ना हो।

बुजुर्ग महोदय ने मुस्कुरा कर कहा :-  अरे लाले दी जान! अपण,तो निपट अकेला ए जीवन दी गड्डी नू मैनू सिंगल इंजन हूं , न कौणू घर गृहस्थी की लाइबिलिटी, न कोई जीवण साथी..

बरखूरदार! तन्ने तो अभी बहुत कुछ करणा सी। तेनु यंग,स्मार्ट एवं तुहाडे जीवन दी गड्डी अभी डबल इंजन दी ए !! बुरा नी मानो, सवाण, बूझणा तो बणता है भई! ” कैंटीन दी चाय क्यों..?? ”

अंकल! जी कम से कम आप तो ऐसी गल्ला ना करो.. मेरे पड़ोसी दे नाते .. तेन्यु सब जांण दे ओ।

मगर आपकी समझ से तो बहु – बेटियां ही सदैव सही होंदी ऐं.. आप तो उनदे ही प्रशंसक हो न??

मगर मैनू इक बात बताइएगा..नारी दा तर्कशील होणा हम मर्दों नू बर्दास्त क्यों नी हों दा ??

अंकल ने कहा ; वो तो है।

  अंकल !! आज हुआ यूं कि, देवी जी को..नारी जाति के एक संवेदनशील मुद्दे पर मैने जान बूझकर थोड़ा सा छेड़ क्या दिया.. उनका तो लैक्चर.. शुरू हो गया जी।

सिचुएशन को समझ.. मैं इत्थे चला आया..

और कई बार हम मर्द ये समझते हुए भी कि वे सही कह रही हैं,तो भी उनके विचार नू इकदम से स्वीकार नी कर दे ऐं क्यों..?? 

बुजुर्ग : बस पुत्तर! इत्ती सी गल! ए।

यू तो हर मर्द दी “ईगो” हों दी ए.. होर कुछ नहीं हों दा ए।

बरखुरदार! “ज़िन्दगी” शबद दा असल मीनिंग केवल पत्नी सु शुरू हों दा ए,परिवार दे होर किसी मेंबरा दे.. ना हों दा ए।

अब देख! आठ बरस हो गए तुआडी आंटी नू अपना स्थूल शरीर छोड्डे। जब मेरे साथ थी, मेन्यु कभी उसकी सुणी ना। इब कम्बख़्त दुनियां से चली गयी, तो भूले से भी भुलाई नी जांदी ए, ऐसा कौण दा पल ए जब उसकी याद ना आंदी ए। घर जांवा तो लग दा ए काटने नू दौड रा ए। इसलिए बाहर ही घूमता रे वा.. यूं।

हालांकि, बच्चे मेरी देखभाल भी अच्छी तरह कर दे ऐं..दोनों बच्चे फाइनेंशियली सेटल्ड हैं। और वे अपने अपने काम में मस्त भी हैं, उं दे आलीशान घर,धन-दौलत गड्डी सड्डी सब कुछ बढ़िया से है…,

पर पुत्तर! अब अपणी जिंदगी दे बिच कोनू मज़ा नी रह गया है।

संयम नियम से रहते हुए.. यूँ ही, अपणे आप नू गुरुवाणी आदि में व्यस्त रख दे ऊ।

अब पुत्तर वाहि गुरु दी गल्ला ही जिंदगी दा सार लग दीं ऐं होर कोई गल्ला अच्छी नी लग दी ऐं,।

उसके जाणे दे बाद मेन्यु पता चलिया,” पत्नी तो हर मर्द दी धड़कन हों दी ए, जब धड़कन ही रुक जां दी ए..तो जीवणा कैसा..??

घर भी उसके बिण मकाण बन दे रेह गया ए

अब तो बेटा युग! सब कुछ बेजाण हों दा ए.. 

लेकिन सोणे पुत्तर तेनु तो काफ़ी समझदार हों दे ओ.. शिक्षक भी लगे हों, बेटा, घर जाओ !! वाहि गुरु दी किरपा ए आप नू अपणी जिंदगी में खुशी दे जीम ते रहो।

    वरना! बाद में पछताणे दे इलावा जीवण बिच कुछ ना रें दा ए।

उस बखत मैनू अंकल दी आंख्या में दर्द व आंसु दा समंदर देख्या, तो चाय के पैसे दे ते ही नज़र भर उस बुजुर्ग फरिस्ते नू देखया,एक भी मिंट गंवाए बिण घर दी ओर चल पड़ा…।

मैन्यू गली दे मोड़ से ही देख लिया था, डबडबाई आँखो से वह मेरी ही वाट जोह रही..थी। मेरे घर दी लक्ष्मी मेरी प्रिय पत्नी, मेरी देवी..चिंतित सी दरवाजे पर ही ख़डी मिली…तुरंत उसने अपने चिर परिचित से शालीन अंदाज में सदैव की तरह कहा..”कहाँ चले गए थे..? जैकेट भी नहीं डाला, ऐसी शीत लहर में। पता है बाहर कितनी ठंड है। आपको ठंड लग जाती तो..?, “

मैनू भी उसी लय में बोल दिया, तुम भी तो “बिना स्वेटर के दरवाजे पर खड़ी हो!, अंदर चलो हवा लग जाएगी..” कुछ यूँ ही दोनों की आँखों ने ,एक दूजे के प्यार नू पढ़ लिया!

कई बार हम लोग अपने जीवन में इसी तरह की गलतियां कर बैठते है। सिर्फ पत्नी ही नही,परिवार के हर सदस्य माँ-बाप, चाचा-ताऊ,भाई-बहिन या अज़ीज़ दोस्तोँ के साथ ऐसा क्रोध, नाराजगी करना, सिर्फ हम को ही नही, उनको भी कष्ट पहुंचाता है।

शिक्षा;- वैसे भी यू छोटा सा जीवण है..  दोस्तो!! कहीं क्षमा करके.. कहीं क्षमा मांग के.. कभी हँस कर, तो कभी चुपके से अपने गम छुपाकर..जीवण गुजार दें। किसी व्यक्ति या वस्तु की कीमत यदि उनके बाद समझी, तो क्या समझी..?? उचित है कि उनके सामने ही उन्हें वो सम्मान मिले जिसके वे हकदार होते हैं।

इसलिए जीवन में कभी भी जजवाती बनकर ऐसी हिमांकत मत कर बैठिएगा।

मशहूर गायक किशोर जी ने अपने अंदाज में ऐसी किसी सिचुएशन को कवर करते हुए गाया होगा ..

   “जिंदगी के सफर में गुजर जाते हैं, जो मकाम, वो..फिर नही आते, वो.. फिर नहीं, आ..ते वो फिर नहीं आ.. ते..” वाकई वे पल सिर्फ यादों में सिमट कर रह जाते हैं। कभी नहीं आते।

पढ़ने के लिए धन्यवाद पूर्ण आनंद के साथ सदैव प्रसन्न रहिये। इस मृत्युलोक में जो प्राप्त है, दरअसल, उसे पर्याप्त समझने को ही “नियति” कहा गया है।।। 🙏🙏

आपका युग पचहरा,

जैन इंटर कॉलेज,सासनी, हाथरस से

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