213-“सनातन”

विवाह उपरांत संसार में किन्हीं कारणों से जीवन साथी को छोड़ने के लिए दो शब्दों का प्रयोग किया जाता है ..

क्रिश्चियन लोग मैरिज करते हैं तो उनके यहां

1-डाइवोर्स (Divorce) लेने का प्रावधान है।

और मुस्लिम निकाह करते हैं इसलिए जब उनमें नहीं बनती है,तो..

2-तलाक (उर्दू) लेने का प्रावधान है।

हम सनातनियों में ईश्वर न करें कभी किसी के जीवन में ऐसी परिस्थिति आए, वैसे भारतीय संस्कृति में मेरी जानकारी के अनुसार शायद अभी तक तो कोई ऐसा प्रावधान है नहीं।

यदि कोई महानुभाव जानते हों, तो “तलाक” शब्द के लिए हिन्दी भाषा में कोई एक शब्द हो, तो उसे शेयर अवश्य करियेगा।

मेरी नहीं दरअसल, ये कहानी आजतक के Editor… संजय सिन्हा की लिखी हुई है…। मगर मुझे लगा आज की युवा पीढ़ी के लिए “इस तथ्य को समझना” जरूरी है तो इसे अपनी ब्लॉग लिस्ट में शामिल करते हुए आपके साथ साझा कर रहा हूं..कहानी इस प्रकार है..

तब मैं… ‘जनसत्ता’ में… नौकरी करता था…एक दिन खबर आई कि… एक आदमी ने झगड़े के बाद… अपनी पत्नी की हत्या कर दी… मैंने न्यूज के लिए हेडिंग बनाई.. कि…

“पति ने अपनी बीवी को मार डाला”…!

खबर छप गई…,अधिकतर को इस हेड लाइन से कोई आपत्ति नहीं हुई… पर जब शाम को… दफ्तर से घर के लिए निकलते समय… अचानक प्रधान संपादक श्री प्रभाष जोशी जी… सीढ़ियों के पास मिल गए…मैंने उन्हें नमस्कार किया… तो कहने लगे कि… “महोदय!…, पति की…तो ‘बीवी’ नहीं होती…!” “पति की…

‘बीवी’ नहीं होती?”

ये सुनकर.. मैं चौंक गया!!

तब उन्होंने कहा..जी हां! “बीवी” तो… ‘शौहर’ की होती है…, ‘मियाँ’ की होती है।

अरे भाई पति की तो…’पत्नी’ हुआ करती है…! ” भाषा के मामले में… जोशी जी के सामने मेरा टिकना मुमकिन नहीं था…,

हालांकि मैं कहना चाह रहा था कि… “भाव तो साफ है न ?” बीवी कहें… या पत्नी… या फिर वाइफ…, एक ही मतलब तो हैं…, लेकिन मेरे कहने से पहले ही…

उन्होंने मुझसे कहा कि… “भाव अपनी जगह है…, शब्द अपनी जगह होते हैं…! भाई जी कुछ शब्द… कुछ जगहों के लिए… बने ही नहीं होते…! ऐसे में शब्दों का घालमेल बहुत गड़बड़ी पैदा कर देता है…। अभी आप युवा हो जरा सोच समझकर लिखा कीजिए..

” खैर…, आज मैं यहां किसी भाषा की क्लास में लैक्चर दे ने नहीं आया हूं…,

आज,तो मैं रिश्तों के एक अलग अध्याय को जीने के लिए आपके साथ इस बिंदु पर चर्चा कर रहा हूं..

लेकिन इसके लिए… आपको मेरे साथ…” प्राचीलता “के पास चलना होगा… वही ‘ प्राचीलता ‘ जिसे अक्सर सभी ‘प्राची’ बोलते थे…जो मेरी स्कूल की दोस्त हैं…, कल उसने मुझे फोन करके अपने घर बुलाया था…फोन पर उसकी आवाज़ से…ही मेरे मन में खटका हो चुका था कि… कुछ न कुछ गड़बड़ है…! मैं शाम को… उसके घर पहुंचा… उसने चाय बनाई… और मुझसे बात करने लगी…पहले तो इधर-उधर की बातें हुईं…,

फिर उसने कहना शुरू कर दिया कि…आजकल उसकी अपने पति नितिन से नहीं बन रही है और अब उसने उसे तलाक देने का फैसला भी कर लिया है…। मैंने पूछा कि… “नितिन है कहां …?” तो उसने बताया कि… “अभी कहीं निकल गए हैं…, बता कर नहीं गए…।” उसने कहा कि… “बात-बात पर झगड़ा होता है… और अब ये झगड़ा बहुत बढ़ गया है…, ऐसे में अब एक ही रास्ता बचा है कि… अलग हो जाएं…, हम आपस में तलाक ले लें…!”

प्राची जब काफी देर बोल चुकी… तो मैंने उससे कहा कि… “तुम नितिन को फोन करो… और घर बुलाओ…, कहो कि संजय सिन्हा घर बैठे हैं..!” प्राची ने कहा कि… आजकल हमारी आपस में बात कहां होती…हैं, मैं फोन कैसे करूं…?!!! अज़ीब सँकट था…!

प्राची को मैं… बहुत पहले से जानता हूं…। मैं जानता हूं कि… नितिन से शादी करने के लिए… उसने अपने घर में कितना उधम मचाया था…! बहुत मुश्किल से… दोनों के घर वाले राज़ी हुए थे…, फिर धूमधाम से शादी हुई थी…। ढ़ेर सारी रस्म पूरी की गईं थीं… ऐसा लगता था कि… ये जोड़ी.. ऊपर से बन कर आई है…! पर शादी के कुछ ही साल बाद… दोनों के बीच झगड़े होने लगे… दोनों एक-दूसरे को खरी-खोटी सुनाने लगे… और आज उसी का नतीज़ा था कि… मैं,संजय सिन्हा.. प्राची के सामने बैठा था …, उनके बीच के इस टूटते रिश्ते को… बचाने के लिए.. बहुत अजीब लग रहा था!!!

खैर…, प्राची ने नितिन को फोन नहीं किया…। मैंने ही नितिन को फोन लगाया… और पूछा कि… “तुम कहां हो..?? मैं तुम्हारे घर पर हूँ…, आ जाओ…। नितिन पहले तो आनाकानी करता रहा…, पर वो जल्दी ही मान गया और घर चला आया…। अब दोनों के चेहरों पर… तनातनी साफ नज़र आ रही थी…ऐसा लग रहा था कि… कभी “दो जिस्म-एक जान” कहे जाने वाले ये ‘पति-पत्नी’..इतने गुस्सा हैं आंखों ही आंखों में एक दूसरे की जान ले लेंगे…क्या!!

मामला इतना बढ़ गया था कि, दोनों के बीच… कई दिनों से बात तक नहीं हो रही थी…!! नितिन मेरे सामने बैठा था…। मैंने उससे कहा कि… “सुना है कि… तुम प्राची से… तलाक लेना चाहते हो…?!!! उसने कहा, “हाँ…, बिल्कुल सही सुना है…। अब हम एक साथ… नहीं रह सकते…।” मैंने कहा कि… “तुम चाहो तो… अलग रह सकते हो…,

लेकिन “तलाक” नहीं हो सकता…!”

“क्यों…???

“क्योंकि तुमने “निकाह” थोड़े ही किया है…!”

“अरे भाई जी…, हमने शादी तो… की है…!”

“हाँ…, ‘शादी’ की है…! मगर सनातन धर्म में … पति-पत्नी के बीच… इस तरह अलग होने का… कोई प्रावधान होता ही नहीं…है।

अगर तुमने ‘मैरिज़’ की होती, तो… तुम “डाइवोर्स” ले सकते थे…!

और यदि ‘निकाह’ किया होता, तो… तुम “तलाक” ले सकते थे…!

लेकिन मेरे भाई क्योंकि… तुमने ‘शादी’ की है…, इसका मतलब ये हुआ कि… “हिंदू धर्म” और “हिंदी” भाषा में… कहीं भी पति-पत्नी के एक हो जाने के बाद… फिर से अलग होने का कोई प्रावधान होता ही नहीं….!!!”

मैंने इतनी-सी बात… पूरी गँभीरता से कही ही थी…, कि दोनों बड़ी जोर से हँस दिए…! दोनों को… साथ-साथ हँसते देख… मुझे बहुत खुशी हुई …

मैंने समझ लिया था कि… रिश्तों पर जमी गलतफहमी की कार्मिक लेयर रूपी बर्फ… अब कुछ पिघलने लगी है…! वो हँसे…, लेकिन मैं गँभीर बना रहा…

मैंने फिर प्राची से पूछा कि…जरा बताओ तो “ये तुम्हारे कौन हैं…?!!!” प्राची ने नजरें झुकाते हुए कहा कि… “पति हैं…!

मैंने यही सवाल नितिन से किया कि… “प्राची तुम्हारी कौन लगती हैं…?!!! उसने भी नज़रें इधर-उधर घुमाते हुए कहा कि…”बीवी हैं…!”

मैंने तुरंत टोका… “ये… तुम्हारी बीवी नहीं हैं…! ये… तुम्हारी बीवी इसलिए नहीं हैं…. क्योंकि… तुम इनके ‘शौहर’ नहीं हो…! ‘शौहर’ इसलिए नहीं…, क्योंकि तुमने इनके साथ “निकाह” नहीं किया… है। तुमने “शादी” की है…! ‘शादी’ के बाद… लड़की पत्नी बनती है..न कि बीवी।

महोदय! हमारे यहाँ जोड़ी ऊपर से… बन कर आती है…! तुम भले ही ये मानो कि… शादी तुमने की है…, पर ये आधा सत्य है…! तुम शादी का एलबम निकाल कर लाओ…, मैं सबकुछ… अभी इसी वक्त स्पष्ट कर दूंगा…!”

अब बात अलग दिशा में चल पड़ी थी…। मेरे एक-दो बार कहने के बाद… प्राची शादी का एलबम निकाल लाई…, अब तक माहौल काफ़ी ठँडा हो चुका था…, एलबम लाते हुए… उसने कहा कि… कॉफी बना कर लाती हूं…।” मैंने कहा.., “अभी बैठो…, इन तस्वीरों को देखो…।” कई तस्वीरों को देखते हुए… मेरी निगाह एक तस्वीर पर गई…, जहाँ प्राची और नितिन शादी के जोड़े में बैठे थे…। और कन्यादान के समय सभी बंधु बांधवों द्वारा कुछ भेंट करने के साथ साथ “वर वधु” के पाँव~पूजन की रस्म चल रही थी…। मैंने वो तस्वीर एलबम से निकाल ली… और उनसे कहा कि… “इस तस्वीर को गौर से देखिएगा…!” उन्होंने तस्वीर देखी… और दोनो साथ-साथ पूछ बैठे कि… “इसमें ऐसा क्या खास है…?!!!”

मैंने कहा कि… “ये पैर पूजन का रस्म है..” वहां पर मौजूद सभी लोग तुम्हारे पांव छू रहे हैं… जबकि उन सभी लोगों से तुम दोनों छोटे हो”

“हां तो….?!!!” “ये एक रस्म है…

ऐसी रस्म सँसार के… किसी धर्म में नहीं मिलेगी … जहाँ छोटों के पांव… बड़े छूते हों…!

लेकिन हमारे यहाँ सनातन में शादी को… ईश्वरीय विधान माना गया है…, इसलिए ऐसा माना जाता है कि… शादी के दिन पति-पत्नी दोनों… ‘विष्णु और लक्ष्मी’ स्वरूप होते हैं…, उस वक्त दोनों के भीतर… ईश्वर का निवास होता है…!

अब तुम दोनों खुद सोचो कि… क्या हज़ारों-लाखों साल से… विष्णु और लक्ष्मी कभी अलग हुए हैं…?!!! स्वाभाविक है..दोनों के बीच… कई एक बार झिकझिक हुई भी होगी,तो क्या उस आधार पर… क्या कभी तुम सोच सकते हो कि…वे दोनों अलग हो जाएंगे…?!!! नहीं होंगे…,

मैं बार बार शुरू से यही कहे जा रहा हूं कि, हमारे यहां… इस रिश्ते में… ये प्रावधान है ही नहीं।

महोदय ! “तलाक” शब्द… हमारा नहीं है…, और न”डाइवोर्स” हमारा है…!” ये सब पथभ्रष्टों के चोचले हैं

तभी दोनों से मैंने ये सवाल भी पूछ लिया कि… “बताओ कि… हिंदी में… “तलाक” को… क्या कहते हैं…???”

दोनों मेरी ओर देखने लगे उनके पास कोई जवाब था ही नहीं।

फिर मैंने ही कहा कि… “दरअसल हिंदी में… ‘तलाक’ शब्द के विकल्प की कोई गुंजाइश ही नहीं है।

हमारे यहां तो… ऐसा माना जाता है कि…यदि एक बार एक सूत्र में बंध गए, तो… कई.. जन्मों के लिए… एक हो गए.. इसलिए जो हो नहीं सकता…, उसे करने की कोशिश भी मत करिएगा…प्लीज!

या फिर… पहले एक दूसरे से ‘निकाह’ कर लो…, फिर “तलाक” लेने की सोचना …!!”

अब तक रिश्तों पर जमी दुनियादारी की “कार्मिक लेयर रूपी बर्फ… काफी पिघल गई थी…! प्राची चुपचाप मेरी बातें सुन रही थी…। फिर उसने कहा कि… “भैया, मैं अब कॉफी बनाकर लाती हूं…।” वो कॉफी बनाने गई…,

मैंने नितिन से बातें शुरू कर दीं…। बहुत जल्दी पता चल गया कि… बहुत ही छोटी-छोटी बातें हैं…, बहुत ही छोटी-छोटी इच्छाएं हैं…, बेकार की ईगो है ..और कुछ नहीं।जिनकी वज़ह से झगड़े हो रहे हैं…।

खैर…, कॉफी आई मैंने एक चम्मच चीनी अपने कप में डाली… मैं नितिन के कप में चीनी डाल ही रहा था कि… प्राची ने रोक दिया…, “भैया…, रूटीन चेक अप में इनका शुगर बढ़ा हुआ आया है.. ये चीनी नहीं लेंगे…”

अरे वाह!!…, अभी घंटे भर पहले तुम… नितिन से “अलग होने” की सोच रही थीं…। और अब… इनके स्वास्थ्य की बड़ी चिंता हो रही है..! क्या बात है!!

मैं ये कहकर जानबूझकर हंस पड़ा..उस समय मेरा हंसना उन्हें रास्ते पर लाने का ही एक आवश्यक पार्ट था।..मुझे हंसते देख प्राची थोड़ा सकपकाई..मगर कॉफी पीने के बाद मैंने कहा कि… “ऐसा है अब तुम लोग… अगले हफ़्ते निकाह कर लो…, फिर तलाक कराने के लिए.. मैं, तुम दोनों की मदद अवश्य करूंगा…! भाई दोस्त हूं मैं आपके काम नहीं आऊंगा तो कौन आयेगा।

मगर शायद अब दोनों को जीवन की “राम कहानी ” अच्छी तरह समझ आ चुकी थी….

“हिन्दी” मात्र एक भाषा नहीं है- “संस्कृति ” है…! इसी तरह “सनातन” को महज एक धर्म ही मत मान लेना – वह एक “सभ्यता” है…!! जिसे हर कीमत पर हमें अपने जीवन में अपनाना ही होगा।

👆उपरोक्त लेख हमारे सनातन धर्म और संस्कृति से जुड़ा है…। आप सभी से निवेदन है कि… समय निकाल कर एक बार अवश्य पढ़ लीजिएगा। धन्यवाद।

विचारक ; पचहरा सर,

जैन कॉलेज,सासनी 🙏

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