212- प्रसाद

प्रसाद क्या है..??

” प्रसाद या भोग” को लेकर अधिकतर लोगों में काफ़ी भ्रांतियां हैं.. जैसे ; कि, हमारे द्वारा ईश्वर व पुण्य आत्माओं को उनके निमित्त जो भोग लगाया जाता है…क्या वे उसे..??

विशेषकर आज का युवा वर्ग इसे एक रूढ़िवादी परंपरा या एक धार्मिक पाखंड के नजरिए से देख रहा है,कई बार व्यंग्य भरे अंदाज में सवालिया निशान भी लगाता है.. ??

अभी इसी सत्र 2023-24 की बात है मेरे एक लैक्चर के दौरान क्लास में एक जिज्ञासु शिक्षार्थी ने कई एक सवाल दागते हुए..कहा,

“पचहरा सर! क्या भगवान हमारे द्वारा चढ़ाया गया भोग ग्रहण करते हैं ?”

और यदि ग्रहण नहीं करते हैं, तो भोग, प्रसाद आदि सब का फिर क्या प्रयोजन…आज के ‘ टेक्निकल वर्ल्ड ‘ में लोग अभी भी ऐसे ढोंग क्यों करते हैं ..??? “

और यदि ग्रहण करते हैं, तो फिर वह वस्तु समाप्त क्यों नहीं होती..? अर्थात थाली में भोग उतनी ही मात्रा में क्यों दिखता है? वह खत्म या कुछ कम क्यों नहीं होता..??

शायद इसीलिए समाज की शिक्षित लॉबी एक शिक्षक को सदैव से आदर्श व्यक्तित्व के रूप में देखती आई है।

हालांकि, शिक्षा के व्यवसाईकरण ने आज शिक्षक को सवालों के कठघरे में खड़ा कर रखा है।

एक शिक्षक के नाते.. ये सवाल मेरे विषय से संबंधित तो नहीं थे, मगर शिक्षक महज एक शिक्षक ही नही, वह लोगों के लिए एक “मर्यादित सोशल फिगर” भी होता है।

वैसे भी जहां तक संभव हो अपनी सामर्थ्य के मुताबिक किसी जिज्ञासु की जिज्ञासा शांत करना न केवल शिक्षक अपितु हर इंसान की एक नैतिक जिम्मेदारी में आता है।

मैने मां शारदे को नमन करते हुए एकदम कूल माइंड होकर उस युवक से कहा,” बेटे! सवाल बहुत अच्छा है। लेकिन ऐसा है आप हमें “णमाेकार मंत्र ..” जो सुबह ईश वंदना में बोला जाता है उसे कंठस्थ करके अपने पी.एस.सी.के पीरियड में अर्थात ‘प्रोब्लम सॉल्यूशन क्लास’ जो अतिरिक्त क्लास के रूप में रोजाना होती है उसमें सुनाइएगा..उसी में आपकी जिज्ञासाओं का समाधान भी हो जायेगा।

विद्यालय से बाहर के लोगों की जानकारी के लिए बता दूं, प्रतिदिन मेरे निर्धारित पीरियड्स से ये एक अतिरिक्त पीरियड होता है.. जिसमें अंग्रेजी व हिंदी विषय में पिछड़े विद्यार्थियों को अपनी दिनभर की समस्याओं के निस्तारण हेतु वक्त दिया जाता हैं।

तब हमने तस्सली से ‘प्रसाद’ से रिलेटेड प्रश्न पूछने वाले अमुक शिष्य को कहा, हां,तो जनाब! सुनाइए “णमोकार मंत्र..” वह लड़का पढ़ाई के प्रति काफी सिंसीयर है इसलिए उसने एकदम शुद्धता पूर्वक सुना दिया। वैसे भी ये हमारे यहां के बच्चों के लिए एक सामान्य सी बात है। मगर मुझे तो इस मंत्र के सहारे प्रसाद या भोग वाले सवालों के लिए एक आधार खड़ा करना था।

अपनी रणनीति के अंतर्गत मैंने जानबूझकर सिर ‘नहीं’ के रूप में हिलाया…,

तब शिष्य ने कहा कि” सर आप चाहें, तो मेरे पास कॉलेज मैगजीन है इस मंत्र को मिलान कर लीजिए; इसमें तो मंत्र ऐसे ही लिखा हुआ है। जो मैं बोल रहा हूं।”

मैने कहा दिखाइए..उसने विद्यालय की आशा पत्रिका मेरे हाथ में थमा दी.. मैंने कहा, “क्यों भई! देखना ! मंत्र, तो इसमें अभी भी वैसे ही लिखा हुआ है।, फिर तुम्हारे दिमाग ने इसमें से क्या..ग्रहण किया, जो तुम बिना देखे बोले जा रहे हो..??? .. छात्र चुप था।

मेरे लिए यही वो मौका था, ‘ प्रसाद या भोग ‘ को लेकर उनकी गलत फहमी को दूर करने का। मैं ने वहां पर मौजूद सभी छात्रों को कहा, कुछ समझे..!! इसी मे प्रसाद या भोग से संबंधित प्रश्न का भी उत्तर छिपा है।

ध्यान दीजिएगा, पुस्तक में जो मंत्र हैं, वह स्थूल रूप में है। जो अभी भी हैं। और सदैव रहेगा।

तुमने जब इसे पढ़ा होगा और बार बार पढ़ा होगा, ताकि याद हो जाय,तो इसके मूल ‘भाव’ को तुम्हारे दिमाग ने ग्रहण कर लिया, अर्थात वह तुम्हें कंठस्थ हो गया अब कभी भी आप इसे अपनी स्मृति में स्टोर हो जाने से सुना सकोगे

मगर एक बात बताइए ! कि पुस्तक या इस पत्रिका में स्थूल रूप में लिखे हुए मंत्र में कोई कमी आई है क्या..??

नहीं..ना। आप देख रहे हो वह पत्रिका में अभी भी वैसे ही लिखा हुआ हैं जैसे पहले लिखा हुआ था, अमुक छात्र ने सहमे हुए अंदाज में कहा..: “जी, सर।”

तो ठीक इसी प्रकार विश्व में व्याप्त ‘परमात्म’ नाम की शक्ति व पुण्य आत्माएं जिस भी रूप में आप उन्हें जानते या मानते हैं, जिनके सामने लगाए व चढ़ाए गए भोग का सूक्ष्म रूप जैसे ; उसकी खुशबू या महक.. मात्र को ग्रहण कर अपनी तृप्ति कर लेते हैं। जिससे थाली में स्थूल रूप में रखी हुई वस्तु लौकिक रूप से हमें वैसी ही नजर पड़ती है, जैसी थी। मगर चूंकि स्थूल भाग से सूक्ष्मरूप सुगंध इष्ट द्वारा ग्रहण कर ली गई है जिससे वह स्थूल वस्तु “प्रसाद” बन जाती है। जिसे सभी लोगों के बीच ‘प्रसाद’ के रूप में बांटने का चलन भी हैं।

इसलिए मेरे विचार से हम रोजाना खाने पीने में जो भी ग्रहण करें ..पहले अपने इष्ट व पुण्य आत्माओं को समर्पित करके अर्थात भोग लगाकर ही ग्रहण करना उचित माना गया है।।

इस प्रकरण को लेख का रूप देने से..

मेरे ख्याल से उस शिष्य के साथ साथ हम जैसे अनभिज्ञ लोगों को भी “प्रसाद” या “भोग” से संबंधित भ्रम लगभग दूर हो गये होंगे। धन्यवाद

जय जिनेंद्र

विचारक: पचहरा सर, के.एल.जैन इंटर कॉलेज, आगरा-अलीगढ़ रोड, सासनी, हाथरस।

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