जी, हां! मानव जीवन का आधार होता है उसका अपना चरित्र अर्थात “ह्यूमन कैरेक्टर”
मनुष्य के चरित्र को यदि सही से परिभाषित किया जाय..तो कम से कम इन तीन मानकों पर तो उसे खरा होना ही चाहिए।
पहला – मानक सर्व विदित है कि लोगों का ‘नारी शक्ति’ के प्रति नजरिया एकदम शुद्ध होना चाहिए।
दूसरा – दुनियां में कुछ जीव, वैज्ञानिक कारणों से या अपनी कर्म गति के आधार पर जन्म से या बाद में दिव्यांग या असहाय हो जाते हैं उनके प्रति हमारा आचरण सदैव सहानुभूतिपूर्ण होना चाहिए..?
तीसरे – न केवल अपने पारिवारिक या चिरपरिचित बुजुर्गों के प्रति बल्कि प्रत्येक जीव मात्र के साथ लोगों का रवैया “सहयोगी स्वभाव” का होना भी नितांत आवश्यक है..??
इन तीनों मानकों पर आधारित चरित्र है, तो आपका चरित्र सुपर.. है। और यदि इन तीन में से किसी एक मानक को लेकर भी आपका मन असहज हो,तो आपका चरित्र प्रश्न चिन्ह के दायरे में है।
यहां मेरा अपना आंकलन ये है कि, इन तीन मानकों की कसौटी पर यदि मानव अपने “आचरण की सत्यता” को खरा रख पाता है..अर्थात वह अपने व्यवहार पर किसी भी तरह का प्रश्न चिन्ह नहीं लगने देता तो वह अवश्य “मानव-चरित्र” की श्रेणी में है।
चलो ! इसे एक वृतांत के ज़रिए थोड़ा आसान करके समझते हैं।
एक बार एक जिज्ञासु व्यक्ति ने किसी संत से पूछा,
कहना न होगा कि,”मानव देह” दुर्लभ है। इस मृत्युलोक में “पुनरपि जन्मम पुनरपि मरणम..” वाले जाल से मुक्ति दिलाने के लिए “मानव-जीवन” को मुक्ति का द्वार बताया गया है। लेकिन यदि उसमें चारित्रिक गुण न हों, तो “ऐसा मानव-जीवन” पशुवत अर्थात धरती का बोझ माना गया है।
“महाराज ! रंग, रूप, प्रकृति एवं शारीरिक संरचना से हम एक जैसे होते हुए भी, केवल कुछ ही लोग क्यों ईश्वर प्रदत्त जीवन को एक जिंदगी का आकार देने में सफल हो पाते हैं। जबकि पदम पुराण के अनुसार अस्सी लाख योनियों की एक लंबी यात्रा के बाद मनुष्य आत्मा के लिए मात्र चार लाख योनि बताई गईं हैं।
जबकि अध्यात्म के नजरिए से दुनियां में एक बहुत बड़ी भीड़ हमारे देखते ही देखते पतन के गर्त में दिन प्रतिदिन डूबती चली जा रही है। इसके बारे में आपकी साधना क्या कहती है..??
संत ने मुस्कराते हुए कहा,
“जाहिर है कि, सामान्य लोगों का अध्यात्म ज्ञान कम होता है। क्योंकि वे भौतिकता में ही रचे बसे रहते हैं।”
इसे जानने के लिए “तुम कल प्रातः मुझे तालाब के किनारे मिलो।
जीवन दर्शन को केवल सैद्धांतिक तौर पर ही नहीं, हमें इसे एक प्रयोग विधि द्वारा यथार्थ में समझना होगा।
अगले दिन जिज्ञासु व्यक्ति सुबह तालाब के किनारे पहुंचा। उसने देखा कि संत अपने दोनों हाथों में एक एक कमंडल लिए खड़े हैं।
जिज्ञासु ने उत्सुकता पूर्वक पास जाकर देखा तो पाया कि, एक कमंडल तो सही है। दूसरे कमंडल की पेंदी में एक छेद है।
उसके सामने ही संत ने दोनों कमंडल तालाब के जल में फेंक दिए। सही वाला कमंडल तो तालाब में तैरता रहा। लेकिन जिसकी पेंदी में छेद था वह कमंडल थोड़ी देर तैरने के पश्चात..जैसे जैसे उसके छेद से पानी उसके अंदर भरता गया.. कमंडल डूबने लगा और अंत में पूरी तरह डूब गया।
जिस प्रकार दूसरे कमंडल में एक छेद था। जिसके कारण वह डूब गया। ठीक उसी प्रकार मनुष्य का “चरित्र” ही है जो उसे इस ‘संसार सागर’ में न केवल जीवित रखता है, बल्कि वही उसे सांसारिक परिस्थितियों से तार (तैरा) सकता है। और जब वह एक दिन दुनियां में स्थूल रूप में नहीं भी होगा, तब भी देश दुनिया, समाज, परिवार या उसके संपर्क में आए लोगों के जहन में मौजूद उसकी सार्थकता उसे सदैव जीवंत रखेगी। जैसे कि कई एक वैज्ञानिक, महापुरुष या संत आज स्थूल शरीर से हमारे मध्य नहीं हैं लेकिन एडिसन,स्टीव जॉब,स्वामी विवेकानंद व कबीर, तुलसी आदि को क्या कोई कभी विसरा पाएगा।
संत ने जिज्ञासु व्यक्ति की ओर मुखातिब होते हुए कहा- “जिस प्रकार दोनों कमंडल रूप रंग और आकार में एक समान दिख रहे थे। वैसे ही सभी मानव वाह्य रूप से लगभग एक जैसे दिखते ही हैं, मगर आंतरिक तौर पर उनका वैचारिक स्वभाव, आचरण वगैरह यहां तक है कि सहोदर भाई बहनों के भी एक जैसे नहीं होते।
अनेकों सद्चरित्र वाले संत, महापुरुष,वैज्ञानिक अपने चारित्रिक बल से आज भी लोगों के मन मस्तिष्क में अर्थात ‘संसार सागर’ में इस सही कमंडल की तरह तैर रहे हैं..
वे पूरी दुनियां में चर्चित हैं..संसार के भटकते लोगों की भीड़ में से भी कुछ ही होंगे जो उनके “मनो भाव” समझकर अपने आपको सद्चरित्र की परिधि में ला सकेंगे। वर्ना एक बहुत बड़ी भीड़ के मन में इतने विकार रूपी छेद हैं कि वे सिर्फ डूबने वाले कमंडल हैं।
कमंडल के छेद की तरह जिनके ‘चरित्र’ में दोष रूपी छेद होते हैं। चाहे कोई लाख जतन करले परंतु वे पतन के गर्त में चलते ही जाते हैं। कई बार हम देखते हैं कि,व्यक्ति सांस के आधार पर तो जिंदा है मगर सभ्रांत लोगों में, प्रतिष्ठित स्थानों पर उसकी उपस्थिति सदैव नदारद ही रहती है। ऐसे चरित्रों की कहीं कोई उपस्थिति नहीं होती।
इसलिए ये कहा गया कि “दुष्चरित्र बेहयाई से भले ही पशुवत जी.. रहा हो..मगर वास्तविकता में तो जीते जी ही उसकी सामाजिक मौत हो चुकी होती है।
अब जिज्ञासु को अपने प्रश्न का उत्तर मिल चुका था।
निष्कर्षत: एक सच्चरित्र मानव ही इस संसार में आत्मोंन्नति को प्राप्त करता है।
शिक्षा:- ध्यान रहे चरित्र एक ‘हीरा’ है इसलिए जीवन में ‘चरित्र’ का महत्व ही सर्वाधिक है।
अतः चाहे जो परिस्थिति हों हर कीमत पर हमें यत्नपूर्वक अपने “चरित्र” की रक्षा करनी ही चाहिए।
सदैव प्रसन्न रहिये। जो प्राप्त हो, उसी को पर्याप्त समझिए।
“संतोषम परम सुखम”
पढ़ने के लिए धन्यवाद
योगेंद्र सिंह पचहरा,
जैन इंटर कॉलेज,सासनी से..
🙏🙏
Sir apka next blog kab aayega 🤔👉
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You like my blogs..I will be continue always..
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Still I am writing …it will be come soon..
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i will wait
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I will also go ahead and write Nobel, I read your blog to learn something.
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Sir, reading your vlogs gives me peace of mind
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Thanks
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