“विद्यालय के अस्सी वर्ष की स्मृतियों” के सौजन्य से.. हमारे प्रातः स्मरणीय पूर्व प्रबंधक श्री अजीतकुमार जी जैन, ने विद्यालय में कई एक शिक्षकों के लगातार सेवा निवृत हो जाने से विद्यालय में आई शिक्षकों की कमी के चलते जब कक्षाओं में “नैतिक शिक्षा” का अध्ययन सुव्यवस्थित तरीके से न हो सकने की स्थिति को भांपते हुए न केवल बेहतरीन उपाय बताया,वल्कि तत्काल प्रभाव से लागू भी हुआ… उपाय ये था कि, सुबह विद्यालय की ईश वंदना के बाद वहीं रोजाना दस मिनट “खेल एवं नैतिक शिक्षा” के पाठ्यक्रम से.. एवं पंचतंत्र की कहानियों आदि के माध्यम से सभी बच्चों में नैतिक एवं मानवीय मूल्यों के निर्माण हेतु प्रधानाचार्य व शिक्षकों द्वारा बारी बारी से बच्चों में नैतिकता का विकास किया जाए। जिससे न केवल शिक्षक व शिक्षार्थियों का नैतिक उन्नयन होने लगा था। वल्कि जानकारी में आने के बाद इसे छात्रों के अभिभावकों द्वारा प्रबंधतंत्र का एक सराहनीय कदम भी बताया।
मगर न जाने किन कारणों से.. ये व्यवस्था विद्यालय में अधिक समय चल न सकी।
और मैं, यदि “विद्यालय के अस्सी वर्ष की स्मृतियों” में कुछ गोते और लगाऊं, तो देश में ऑनरेरी मजिस्ट्रेट के पद को सुशोभित कर चुके..हमारे पूर्व प्रबंधक परम श्रद्धेय श्री सी.एल.जी जैन अर्थात मेरी मान्यताओं के आदर्श बड़े बाबूजी का भी “नैतिकता” के साथ बहुत गहरा रिश्ता था। वे प्रति पल अपने छात्रों व विद्यालय के सर्वांगीण विकास के बारे में न केवल सोचते अपितु विद्यालय के धरातल पर तत्काल उस कार्य को मूर्तरूप भी दे दिया करते थे। इस संदर्भ में एक उत्कृष्ट उदाहरण विद्यालय का विशाल एवं भव्य “पुस्तकालय” है। विद्यार्थियों के बैठकर अध्ययन करने के लिए अनेकों डाइनिंग टेबल्स से युक्त हॉल किसी डिग्री कॉलेज के पास भी उपलब्ध नहीं होगा।
शिक्षा के प्रति उनके इस समर्पित भाव के पीछे उद्देश्य यही था कि, “छात्र हमारे विद्यालय में शिक्षार्थ आएं..और यहां के शैक्षणिक वातावरण में शिक्षकों के प्रयास से वे नैतिक व मानवीय मूल्यों से ओतप्रोत हों.. तब एक “चरित्रवान नागरिक” बनकर देश व दुनियां की सेवार्थ जाएं..।”
दरअसल, “नैतिक शिक्षा” ही एकमात्र वह विषय है जो छात्र/छात्राओं के अंदर अनेकों ‘चारित्रिक,नैतिक व मानवीय मूल्यों’ को स्थापित करने की सामर्थ्य रखता है।
..मगर विडंबना देखिए! शीर्ष पर बैठे हमारे शिक्षाविद जो माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की नीतियों का निर्धारण करते हैं..उन्होंने हाईस्कूल व इंटरमीडिएट के छात्र-छात्राओं के चरित्र निर्माण में ‘नैतिकता” को आवश्यक मानते हुए “नैतिक शिक्षा” को एक विषय के रूप में मंजूरी तो अवश्य दी, लेकिन आधी अधूरी..
ये विद्यार्थी के लिए एक विषय तो है मगर शासन ने विद्यालय स्तर पर न तो इसके लिए अतिरिक्त शिक्षकों की ही कोई व्यवस्था की है, और न इस विषय के अंक परीक्षार्थी की मैरिट में जोड़े जाने का कोई प्रावधान है।”
स्वाभाविक बात है कि, शैक्षिक पाठ्यक्रम में इस विषय की रेस गणित, विज्ञान व अंग्रेजी जैसे विषयों के साथ करा रखी है।।
मगर इस संदर्भ में.. मैं, एक शिक्षक होने के नाते आपको आश्वस्त करना चाहूंगा, कि, ‘नैतिक शिक्षा’ की विषय सामग्री में वो क्षमता है। कि यदि हमारे प्रदेश भर में कॉलेज-प्रशासन अपने स्तर से नैतिक शिक्षा का ‘शिक्षण कार्य’ ईमानदारी के साथ संपादित करा पाएं, तो न केवल ये विषय गणित,विज्ञान व अंग्रेजी के साथ कंधे से कंधा मिला कर चलने की क्षमता रखता है, बल्कि प्रदेश में आए.. दिन होने वाली चरित्र हीनता की घटनाओं के आंकड़ों में भी गिरावट ला सकता है।
ये जाहिर सी बात है छात्र/छात्राएं जब इस चारित्रिक और नैतिक विषय को विधिवत् रूप से पढ़ेंगे, और समझेंगे तो निश्चित रूप से उनके आचरण में भी ‘पवित्रता’ आयेगी।
जिस प्रकार श्रीमद् भगवत गीता में प्राणी की समस्त सांसारिक समस्याओं का निदान है। उसी प्रकार भारतीय समाज की काफी समस्याओं का निवारण इस ‘नैतिक शिक्षा’ के नियमित पाठन में निहित है।
मैं पुनः कहूंगा, कि नैतिक शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषय की निरादरी करने के पीछे असल मुद्दा माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा इसके अंक परीक्षार्थी की मैरिट में न जोड़ना है।
क्या आपको नहीं लगता .. कि, नैतिक व मानवीय मूल्यों से ओतप्रोत इस ‘नैतिक शिक्षा’ जैसे विषय के साथ मखौल किया जा रहा है.. ??
देश दुनियां में आए दिन.. होने वाली चरित्र हीनता की घटनाओं को देखते हुए हमारे युवक व युवतियों के लिए “नैतिक शिक्षा” के ज्ञान की आवश्यकता और बढ़ जाती है।
इस विषय के साथ अनैतिकता की पराकाष्ठा, तो तब और हो जाती है…जब कोई शिक्षक..जिसको ‘नैतिक शिक्षा’ जैसे महत्वपूर्ण विषय के कालांश आवंटित हो जाते हैं वह उनको “राहत कालांश” के रूप में देखता है।
दरअसल, शिक्षा विभाग द्वारा निर्धारित शिक्षकों के साप्ताहिक कालांश 30 और 36 निश्चित किए गए हैं।
नैतिक शिक्षा के कालांश जोड़कर उनकी संख्या टाइम टेबल चार्ट पर पूरी दर्शाने के उद्देश्य से वो भी विज्ञान प्रयोगात्मक कार्य की आड़ में सब चल रहा है।
जबकि विज्ञान में प्रयोगात्मक कार्य कितना होता है इसकी हकीकत भी किसी से छुपी नहीं है??
सच तो ये है कि, इस रवैए से.. शिक्षक स्तर पर उचित रूप से न तो विज्ञान में प्रयोगात्मक कार्य ही हो पाते हैं और न हीं “नैतिक शिक्षा” का अध्ययन।
आप ही बताइए ये “नैतिक संग अनैतिक” कार्य नहीं है..तो क्या है..?? यदि है,तो एक सही चिंतन के बाद उचित निर्णय लेने की दरकार,तो है!!! अब लें या न लें ये ज़िम्मेदार लोगों का काम है।
धन्यवाद
युग पचहरा;
Yas sir right 👍
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Thanks 👍
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