विचार कीजिएगा.. हमें अपनी और अपनों की मृत्यु ही डरावनी क्यों लगती है।
जबकि चतुराई में दम भरता मानव अन्य की मौत को तो enjoy करता है।
सही मायने में आज उसे आदमी …मानव या इंसान कहना बेमानी लगता है।
लेकिन ये भी तो एक सवाल है आखिर उसे फिर क्या कह कर अभिव्यक्त किया जाय..?
मैं जानता हूं आपका वक्त बेशकीमती है। मगर plz. थोड़ा समय निकाल कर एकबार पूरा पढ़ ही लीजिएगा 🙏
✍️ मौत के ‘स्वाद’ का चटखारे लेता …”मानव बना दानव”
थोड़ा कड़वा तो लगेगा..पर दुर्भाग्य से आपके मानस-पटल पर दुनियां की वास्तविक तस्वीर उकेरता..’विचार….’
“किसी को मौत देने से डर नहीं, वो,तो हमारा ‘स्वाद’ है”
बकरे का,
गाय का,
भेंस का,
ऊँट का,
सुअर,
हिरण का,
तीतर का,
मुर्गे का
हलाल का,
बिना हलाल का,
ताजा बकरे का,
भुना हुआ,
छोटी मछली,
बड़ी मछली,
हल्की आंच पर सिका हुआ।
न जाने कितने बल्कि अनगिनत स्वाद हैं मौत के।
क्योंकि वह मौत किसी और की है, ‘स्वाद’ हमारा….है।
‘स्वाद’ से शुरू होकर..धीरे-धीरे ‘मौत’ एक दिन इतना बड़ा कारोबार का आकार ले लेगी किसी ने सोचा भी नहीं होगा…
मुर्गी पालन, मछली पालन, बकरी पालन, पोल्ट्री फार्म्स।
नाम ‘पालन’ और मक़सद ‘हत्या’ ❗
स्लाटर हाउस तक खोल दिये लोगों ने। वो भी ऑफिशियल। गली गली में खुले नॉनवेज रेस्टॉरेंट, मौत का कारोबार नहीं तो और क्या हैं ये..??
मौत से प्यार और उसका कारोबार इसलिए क्योंकि मौत हमारी नही दूसरों की है,बेजुबानों की है। जो हमारी तरह बोल नही सकते, अपनी परेशानी अभिव्यक्त नही कर सकते, अपनी सुरक्षा स्वयं करने में समर्थ नहीं हैं, शर्म आनी चाहिए..उनकी असहायता को हमने अपना बल कैसे मान लिया ?
कैसे मान लिया कि उनमें भावनाएं नहीं होतीं ? या उनकी आहें नहीं निकलतीं ?
जबकि जगदीश चंद्र बसु जिन्होंने बहुत समय पूर्व ‘क्रेस्कोग्राफ’ नामक यंत्र से पौधों तक के बारे में यह सिद्ध कर दिया..है कि, ‘पौधे’ न केवल हमारी तरह सांस लेते हैं, बल्कि अच्छा या बुरा भी महसूस करते हैं क्योंकि उनमें भी ❤️ हार्ट होता है। और हम अपनी आंखों से साक्षात चलते-फिरते,जीते-जागते बेचारे निरीह प्राणियों को सजीव देखने के बावजूद भी बेरहमी से मार-मार कर बड़ी शान से कारोबार चला रहे हैं। धिक्कार है!! मानव होने पर..
डाइनिंग टेबल पर हड्डियां नोचते बाप बच्चों को सीख देते है, बेटा कभी किसी का दिल नही दुखाना ! किसी की आहें मत लेना ! किसी की आंख में तुम्हारी वजह से आंसू नहीं आना चाहिए !
बच्चों में झुठे संस्कार डालते बाप को, अपने हाथ मे वो हडडी दिखाई नही देती, जो इससे पहले एक चलता फिरता शरीर थी, जिसके अंदर इससे पहले एक आत्मा थी, आपकी तरह उसके भी मां-बाप थे …??
जिस जीव को काटा गया होगा ? जो कराहा होगा ? जो तड़पा होगा ? जिसकी आहें निकली होंगी ? जिसकी आत्मा ने क्या बददुआ नहीं दी होगी ?
हमने कैसे मान लिया कि जब जब धरती पर अत्याचार बढ़ेंगे तो भगवान सिर्फ तुम जैसे मानव के भेष में दानवों की रक्षा के लिए अवतार लेंगे ..❓ क्या मूक जानवर उस परमपिता परमेश्वर की संतान नहीं होते..❓
क्या ईश्वर को उनकी रक्षा की चिंता नहीं होती ..❓
धर्म की आड़ में उस परमपिता के नाम पर अपने स्वाद के लिए कभी ईद पर बकरे काटते हो, कभी दुर्गा मां या भैरव बाबा के सामने बकरे की बली चढ़ाते हो। कहीं तुम अपने स्वाद के लिए मछली का भोग लगाते हो । क्या कभी सोचा …!!! ईश्वर का स्वाद क्या होता है ? ….क्या है उनका भोजन ?
किसे ठग रहे हो ? भगवान को ? अल्लाह को ? जीसस को? या खुद अपने आपको ?
लोग बड़ी बेशर्मी से बोलते हैं मंगलवार को मैं नानवेज नही लेता …!!! आज शनिवार है इसलिए नहीं …!!! अभी रोज़े चल रहे हैं ….!!! नवरात्रि में तो सवाल ही नही उठता ….!!!
झूठ पर झूठ…. …झूठ पर झूठ ..झूठ पर झूठ ..
दरअसल, ईश्वर ने मनुष्य को बुद्धि सिर्फ इसलिए दी, ताकि तमाम योनियों में भटकने के बाद मानव योनि में तुम जन्म मृत्यु के चक्कर से निकलने का रास्ता ढूँढ सको।
लेकिन तुमने इस मानव योनि को पाते ही स्वयं को भगवान समझ लिया। तुम्ही कहते हो, कि हम जो प्रकति को देंगे, वही प्रकृति हमे लौटायेगी
ये संकेत है ईश्वर का। प्रकृति के साथ रहो। प्रकृति के होकर रहो। तो फिर पालन क्यों नहीं करते हो..?? भई!!
🙏 जय श्री राम 🙏 ईश्वर आपको सद्बुद्धि दें ताकि आपका जीवन मंगलमय हो
आपके ;
🙏
पचहरा सर,