202- कटी-पतंग

एक बार एक पुत्र ने अपने पिता से पूछा!

पिता जी!.. अक्सर लोग ‘सफल जीवन’ सफल जीवन करते रहते हैं..

आख़िर जीवन में “सफलता” के मानक हैं क्या..??

पिता ने कहा; बेटा! अंग्रेज कवि ‘बैन जॉनसन’ के मुताबिक “Perfect Life” का long life से,तो कोई सरोकार होता ही नहीं। मगर..

Theme of the poem..” A short and meaningful life is far better than life that is long but uneventful.”

कवि के अनुसार,तो दुनियां बिच जब तक भी रहो प्रसन्नता पूर्वक एवं अपने परिवार, समाज या देश दुनियां के लिए उपयोगी रहो।

मगर ये बताते हुए उस पिता को लगा कि बच्चा जीवन की सफलता का फलसफा अभी भी जान नहीं पा रहा है,तो अमुक पिता अपने बेटे को सही से समझाने के लिए एक खुले मैदान में पतंग 🔶 उड़ाने के लिए ले गया..

मैदान पर बेटा अपने पिता को पतंग उड़ाते हुए बड़े ध्यान से देख रहा था…

थोड़ी देर बाद बेटा बोला- पापा.. मुझे लग रहा है कि इस धागे की वजह से पतंग की उमंग पूरी नहीं हो पा रही.. पतंग अपनी पूरी आजादी से ऊपर की ओर उठ भी नहीं पा रही है, क्यों न इस धागे को तोड़ दें !! धागे से आजाद होते ही ये बहुत ऊंची जा सकती है।….

पिता को तो आज उसे सबक सिखाना ही था.. इसलिए उसके कहते ही, पिता ने तुरंत पतंग को धागे से मुक्त कर दिया ..

जैसे ही वह धागे से कटी, एकबार तो थोड़ा सा ऊपर जाती हुई दिखी…मगर तभी घुमेड सी खाने लगी..फिर,तो ऐसी नीचे गिरी … कि वह “कटी-पतंग” उनकी आंखों से ओझल होती ही चली गई..।

तभी पिता ने कहा, बेटा यही हाल इंसान का होता है..परिवार व समाज से कट होते ही वो भी कहीं खोता सा चला जाए.. उसकी हालत भी “कटी-पतंग” जैसी ही हो जाए।

इसी के सहारे..एक पिता अपने बेटे को जीवन के वास्तविक ‘दर्शन’ को समझाने का प्रयास करते हुए कहता है कि, बेटा.. ‘जिंदगी में हम जिस ऊंचाई या जिस किसी मुकाम पर होते हैं..हमें अक्सर यही लगता है कि, कुछ चीजें, जिनसे हम जुड़े हुए हैं, वे हमें आगे बढ़ने से रोक रही हैं।..तभी अनमेंच्योर-लोग ऐसा सोचते हैं..क्यों न हम इन बेवजह के बंधनों से अपने आपको मुक्त कर लें..??

अर्थात

इनसे आज़ाद हो जाएं!! …

वास्तव में, जिन्हें लोग बंधन मानते हैं वही वे पतंग रूपी धागे हैं जो पारिवारिक एवं सामाजिक संबंधों के रूप में भारतीय समाज की व्यवस्था को ‘सुदृढ़’ बनाए रखते हैं।

अतः ये धागे हमें उस ऊंचाई पर बनाये रखने के लिए परम आवश्यक हैं.

-घर-⛪ -परिवार-👨‍👨‍👧‍👦 -अनुशासन-🏃🏼 -माता-पिता-👪 -गुरूवर,👵🏻 -समाज उसके बाद देश फिर ये सारी दुनियां।

. ध्यानपूर्वक समझ लें ..

हो सकता है..’इन संबंध रूपी धागों से अलग होने पर..शुरू शुरू में कुछ समय के लिए आपको लगे, कि आपने ठीक किया। और आप कुछ सुकून सा भी महसूस करें, जैसे पतंग धागे से कट होने पर एक पल के लिए राहत की सांस लेते हुए ऊपर की ओर उठना चाहती है परंतु कोई आधार या सहारा न होने के कारण दूसरे ही पल घूमेड़ खाकर गिरते हुए धूल चटाने को मजबूर हो जाती है।

इसी प्रकार कुछ ही समय बाद इंसान को भी संकेत मिलने लग जाते हैं। कई बार समझदार लोग समय रहते स्थिति को संभाल लेते हैं..और वहीं अपनी अज्ञानता में मदहोश लोग ईगो के चलते “कटी पतंग” की तरह दिन प्रतिदिन गर्त में चलते चले जाते हैं।

“अतः जीवन में यदि अच्छाई रूपी ऊंचाई पर जाना और फिर उस ऊंचाई पर बने रहना चाहते हो,तो उस ऊंचाई को मेंटेन रखने के लिए अपने पूर्वजों द्वारा बनाए गए इन धागे रूपी रिश्तों के ताने बाने के साथ हमेशा संतुलन बनाए रखियेगा। क्योंकि कोई भी “रिश्ता” कभी छोटा नहीं होता।

नोट;- इसलिए भूलकर भी किसी रिश्ते को पतंग की तरह “झटकर कभी तोड़िएगा..नहीं।” यदि कभी कोई रिश्ता असहज लगने लगे,तो कुछ दिन धैर्य पूर्वक थोड़ा शांत रहिएगा..वक्त पुनः उस अमुक व्यक्ति को रिश्ते तरजीह समझा देगा।

“धागे का पतंग से जो सम्बन्ध है। वैसा ही कच्चा सा हम इंसानों का हर रिश्ते के बीच संबंध होता है। उसके सही संतुलन से प्राप्त ऊंचाई को ही विद्वानों द्वारा “सफल-जीवन” अनुकरणीय.. या एक आदर्श जीवन की संज्ञा दी गई है। जिसे न केवल सब देखें बल्कि ऐसा जीवन जिसे हर कोई जीना चाहे। उस जीवन को ही “सफल जीवन” कहा जाता है। 👍

विचारक ; योगेंद्र सिंह पचहरा फ्रॉम नीमगांव 🙏🙏

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