“ढोल,गंवार,क्षुब्ध पशु, रारी..” का पार्ट 2 यदि ऐसा ही होता तो.. भील शबरी के जूठे बेर को भगवान द्वारा खाये जाने का वह चाहते तो लेखन न करते।
यदि ऐसा होता तो केवट को गले लगाने का महिमा मंडन भी न करते।
स्वामी जी के अनुसार.. ये चौपाई सही रूप में – ढोल,गवार, शूद्र,पशु, नारी नहीं है बल्कि यह “ढोल,गवार,क्षुब्ध पशु,रारी” है।
ढोल = बेसुरा ढोलक गवार = गवांर व्यक्ति क्षुब्ध पशु = आवारा पशु जो लोगो को कष्ट देते हैं रार = कलह करने वाले लोग
चौपाई का सही अर्थ है कि जिस तरह बेसुरा ढोलक, अनावश्यक ऊल जलूल बोलने वाला गवांर व्यक्ति, आवारा घूम कर लोगों की हानि पहुँचाने वाले.. (अर्थात क्षुब्ध, दुखी करने वाले पशु और रार अर्थात कलह करने वाले लोग जिस तरह दण्ड के अधिकारी हैं.! उसी तरह मैं भी तीन दिन से आपका मार्ग अवरुद्ध करने के कारण दण्ड दिये जाने योग्य हूँ।
स्वामी राम भद्राचार्य जी के अनुसार श्रीरामचरितमानस की मूल चौपाई इस तरह है और इसमें ‘क्षुब्ध’ के स्थान पर ‘शूद्र’ कर दिया और ‘रारी’ के स्थान पर ‘नारी’ कर दिया गया है। भ्रमवश या भारतीय समाज को तोड़ने के लिये जानबूझ कर जो भी है गलत है। जिस तरह से ये प्रकाशित किया जाता रहा है।
इसी उद्देश्य के लिये उन्होंने अपने स्वयं के द्वारा शुद्ध की गई अलग रामचरित मानस प्रकाशित कर दी है।रामभद्राचार्य कहते हैं। धार्मिक ग्रंथो को आधार बनाकर गलत व्याख्या करके जो लोग हिन्दू समाज को तोड़ने का काम कर रहे है उन्हें सफल नहीं होने दिया जायेगा।
आप सबसे से निवेदन है , इस लेख को अधिक से अधिक share करें। और तुलसीदास जी की चौपाई का सही अर्थ लोगो तक पहुंचायें हिन्दू समाज को टूटने से बचाएं, हमारे धर्म को तोड़ने में तथाकथित हमारे धर्म के ही लोग है अन्य किसी में इतनी हिम्मत नही,जो हमें मिटा दे।👍
“वसुधैव कुटुम्ब कम”
पचहरा सर 🙏
Great thinking
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Thanks 👍
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