एक कदम सत्य की ओर..
आओ चलें इस तथ्य को जानने का प्रयास करते हैं..जिसे एक लंबे अर्से से भारतीय समाज के समक्ष तोड़-मरोड़ कर परोसा जाता रहा.. है।
छेड़छाड़ करने वालों ने इतिहास तो इतिहास भारतीय ग्रंथों को भी अपनी छेड़छाड़ से अछूता नहीं रखा !!!
देखिए एक सामान्य सी बात है जहां एक ओर किसी का महिमामंडन हो रहा हो वहीं फिर दूसरी ओर तिरस्कार किया जाना, गले से नहीं उतरता।अर्थात विश्वास नहीं होता!!
एक दिन काफ़ी लोकप्रिय मैग्जीन में एक प्रसंग पढ़ने को मिला जिसे मैं आज आपके साथ साझा कर रहा हूँ:-
(जैसा मिला वैसा ही “As it is” शेयर कर रहा है)
❌ “ढोल, गवार, शूद्र, पशु, नारी.!”~❌
आज तक इसे गलत प्रचारित किया गया है
सही शब्द हैं ✅
👇🏿 “ढोल, गवार, क्षुब्ध पशु, रारी, सकल ताड़ना के अधिकारी!!”
श्रीरामचरितमानस मे, “शूद्रों और नारी” का अपमान कहीं भी नहीं है।
भारत के राजनैतिक शूद्रों को पिछले 450 वर्षों में गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित हिंदू महाग्रंथ ‘श्रीरामचरितमानस’ की कुल 10902 चौपाईयों में से आज तक मात्र एक ही ऐसी चौपाई पढ़ने में आई है, जो अपने तथ्य पर सत्य नहीं है।
और वह अंश है..जब भगवान श्री राम का मार्ग रोकने वाले समुद्र द्वारा भय वश किया गया अनुनय-विनय..
जो कि सुंदर कांड में 58 वें दोहे की छठी चौपाई है ..
“ढोल, गँवार, क्षुब्ध, पशु नारी.! सकल ताड़ना के अधिकारी”
इस सन्दर्भ में चित्रकूट में मौजूद तुलसीदास धाम के पीठाधीश्वर और विकलांग विश्वविद्यालय के कुलाधिपति “श्री राम भद्राचार्य जी” जो नेत्रहीन होने के बावजूद ‘संस्कृत, व्याकरण, सांख्य, न्याय, वेदांत,’ में इन पाँचों में कई एक बार GOLD Medal जीत चुकें हैं।
श्री राम भद्राचार्य जी का कहना है कि बाजार में प्रचलित रामचरितमानस में तीन हजार से भी अधिक स्थानों पर अशुद्धियां हैं जिन्हें सुधारने की आवश्यकता है।”.. उन्ही अशुद्धियों में से एक ये चौपाई भी है जिसे अशुद्ध तरीके से प्रचारित किया जा रहा है। उनका कथन है कि.. हम सभी अच्छी तरह जानते हैं तुलसीदास दुष्प्रचारक नहीं थे, विचार करें..
यदि तुलसीदास जी की मंशा सच में ‘शूद्रों और नारी’ को प्रताड़ित करने की रही होती, तो क्या रामचरित् मानस की 10902 चौपाईयों मे से इस एक चौपाई में ही वह ऐसी ओच्छी बात करते..? मुझे तो ये सम्भव नहीं लगता!!
आगे का शेष प्रकरण भी बहुत शीघ्र.. पार्ट 2 में पब्लिश किया जायेगा👍