193-प्रारब्ध एवं पुरुषार्थ

प्रारंभ से देखा गया है.. कि, आध्यात्मिक जिज्ञासुओं के बीच इस सिद्धांत पर चर्चाएं कहीं न कहीं होती रही है कि,

“प्रारब्ध / Destiny

पुरुषार्थ/ Free-Will “

इन दोनों में से ‘मानव-जीवन’ किससे चलता है..?

प्रश्न है.. Destiny से या Free-Will से..???

आख़िर, मनुष्य अपने जीवन में “भाग्य” से ‘सुखी’ व ‘सफल’ होता है या अपने द्वारा किए गए.. “प्रयासों” से..???

प्रोफाउंड-स्कॉलर्स का कहना है कि, दुनियाँ के अधिकतर लोग या तो so call इंटेलेक्चुअल हैं या बहुत मॉडर्न..???

उनकी राय में ‘लक’ जैसा कुछ भी नहीं होता..दुनियाँ में। वे सब कुछ efforts से ही करने को तरजीह देते हैं।

अब विचारणीय प्रश्न ये है कि, ‘मानव-जीवन’ में आख़िर ‘लक’ का रॉल है.. तो कितना.???

एकबार अपने कॉलेज की लाइब्रेरी में मैंने ‘द साइकोलॉजी ऑफ मनी’ नामक पुस्तक पढ़ी.. रिकमंड करना चाहूंगा कि, वह अद्भुत पुस्तक आपको भी पढ़नी चाहिए।

उसके एक चैप्टर..’द लक एंड रिश्क’ के हवाले से बताना चाहूंगा कि, इस चैप्टर में ‘माइक्रोसॉफ्ट’ और ‘बिल्गेट्स’ के बारे में एक रोचक सी जानकारी दी गयी है..इस पुस्तक के लेखक मिस्टर मॉर्गन स्वयं बताते हैं कि, उन दिनों पूरी दुनियां में ‘लेक साइट-स्कूल ही एकमात्र ‘हाई स्कूल’ हुआ करता था। जिसमें कि ‘कंप्यूटर’ था। बिल्गेट्स उस में पढ़ते थे।

मैंने वह चैप्टर न केवल गम्भीरतापूर्वक पढ़ा,वल्कि बड़ी गहनता से एक-एक आँकड़े को समझने का प्रयास भी किया।

और क्यों न हो आंकड़ा है ही इतना दिलचस्प ज़रा आप भी पढियेगा..👍

जब 1968 में पूरे विश्व में हाई स्कूल स्टैंडर्ड में पढ़ने वाले कुल 303 मिलियन स्टूडेंट्स थे। उनमें से 18 मिलियन अमेरिका में थे। और एक लाख के करीब यू.एस. के सिएटल एरिया में थे। उनमें से मात्र 300 बॉयज ‘लेक-साइट स्कूल’ में थे, जहां बिल्गेट्स पढ़ते थे। नंबर पर ध्यान दीजियेगा 303 से शुरू हुआ और 300 पर आकर रुका। यानी एक मिलियन पर लगभग एक स्टुडेंट.. था।

क्योंकि उस वक्त 300 हाई स्कूल ऐज-ग्रुप के लड़के ‘लेक-साइट’ स्कूल में पढ़ रहे थे।

आपको पढ़कर या ऐसा सुनकर थोड़ा असहज अवश्य लगेगा..मगर सत्य है.. क्योंकि कि बिल्गेट्स अपनी एक डॉक्युमेंट्री में यहां तक कहते हैं कि,”यदि उन दिनों “लेक-साइट स्कूल” नहीं होता..!!, तो शायद आज दुनियां में माइक्रोसॉफ्ट भी नहीं होता।”

प्रारब्धवश इसी स्कूल में बिल्गेट्स की मुलाकात ‘पॉल-एलन’ से होती है। ये आप जानते ही हैं कि, बिल्गेट्स & पॉल एलन ‘माइक्रोसॉफ्ट’ के सह-संस्थापक हैं। लेकिन प्रारब्ध की असली मज़ेदार कहानी, तो अब शुरू होती है।

बिल्गेट्स और पॉल एलन के साथ उसी स्कूल में एक तीसरा लड़का और पढ़ता था जिसका नाम था ‘ कैंट इवन्ट्स ‘। ये लड़का कम्प्यूटर एवं बिज़निस की बातों में बिल्गेट्स एंड पॉल एलन से भी कहीं अधिक दक्ष (स्किल्ड) था। ये मैं नहीं कह रहा..वहां पर सभी लोगों का ऐसा ही मानना था। बिल्गेट्स भी स्वयं यही मानते थे।

कहना न होगा कि, दुर्भाग्यवश..

वल्कि ‘प्रारब्धवश’ एक पर्वत रोहण ‘माउंटेनिंग’ की घटना में, जिस वक्त ‘कैंट इवन्ट्स’ हाई स्कूल में ही था, तभी वह एक अप्रिय घटना का ग्रास बन जाता है। अर्थात उस बेचारे की ‘मौत’ हो गई।

यदि इस घटना को ‘नियति’ के खेल-निराले’ वाले नजरिए से .. देखा जाए..जैसे; बिल्गेट्स का विश्व के एकमात्र ऐसे विद्यालय में पढ़ना, जहां कंप्यूटर हो..और बाद में ‘कैंट’ नामक लड़के की अचानक मृत्यु हो जाना। ये दोनों ही बातें ये साबित करती हैं कि, ‘प्रारब्ध’ का रॉल हमारे जीवन में बहुत कुछ महत्व रखता है। अर्थात आप भी किसी हद तक मेरी इस बात से सहमत हो रहे होंगे कि, मानव-जीवन में ‘लक’ नामक के फैक्टर का अस्तित्व है,तो अवश्य।

ये विचार फाइनलाइज हो जाने पर कि “मानव-जीवन में ‘लक’ का भी अपना रॉल होता है।” तब आज की मॉडर्न लॉबी के तर्कों को हवा मिल जाना स्वाभाविक है..और ऐसी परिस्थिति में..

‘ह्यूमन-इफ़्फ़र्ट्स’ स्वत: ही सवालों के घेरे में आ जाते हैं ..???

लेकिन बंधुवर! समस्याओं की ऐसी सन्देहात्मक स्थिति में केवल हम सामान्य जन ही नहीं होते, अपितु इस बात के लिए हमारे ग्रंथ भी साक्षी हैं कि ऐसी परिस्थिति से बारह कलाओं से युक्त हम सबके पूज्य श्रीराम जैसे चरित्र भी कई बार गुज़रे थे। उन्होंने ऐसे वक़्त पर अपने धैर्य का परिचय देते हुए..एकबार पूज्य गुरु देव वशिष्ठ जी से अपनी समस्या का समाधान पूछा! तो उन्होंने समझाते हुए कहा कि,

“हमारे जीवन रूपी वन में दो प्रकार के फल देने वाले वृक्ष होते हैं। जिसमें एक का नाम है “प्रारब्ध” और दूसरे का “पुरूषार्थ”। मनुष्य के जीवन में इन दोनों में से जिसका ‘बल’ (फ़ोर्स) यानी तीब्रता अधिक होती है वही प्रभावी होकर हमें परिणाम देने लगता है।

इस बिंदु को एकबार पुनः अपने चिंतन में जगह देते हुए.. विचारिएगा कि, ‘प्रारब्ध’ और ‘पुरुषार्थ’ में से जीवन में जो प्रभावी होगा, उसकी.. सफलता या असफलता भी वही तय करेगा।

इस बिंदु पर यदि रिसर्च की जाए.. और अपने आपको गहराई में उतरा जाय, तो हम पायेंगे कि, “प्रारब्ध एवं पुरुषार्थ” दो अलग-अलग चीजें हैं ही नहीं। वस्तुत: वे दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।

इसे और स्पष्ट करने के लिए मैं यही कहुंगा प्रारब्ध और पुरुषार्थ का पूरा आधार इस पर निर्भर करता है कि, कर्म कब..? एवं किन परिस्थितियों में हुआ है..? और विशेषतः किस “भाव” से हुआ है..? यही वह कसौटी है, जिस पर समूचा जगत टिका है।

जो शुभ अशुभ ‘कर्म’ मनुष्य पिछले जन्म में करके आया है। वही “संचित कर्म” वर्तमान जन्म का ‘प्रारब्ध’ होते हैं।

सच तो ये है, जो ‘कर्म’ मनुष्य अब कर रहा है..वह अपने अगले जन्म का ‘प्रारब्ध’ गढ़ रहा है।

उल्लिखित वृतांत के आधार पर यदि मनुष्य को उसके भाग्य का ‘विधाता’ कह दिया जाय, तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन..”

‘मानव-जीवन’ में मूलतः कर्मों की प्रधानता है। “

प्रारब्ध और पुरुषार्थ पर से इतना पर्दा उठ जाने के बाद.. नई पीढ़ी के लोग कई बार एक और अहम सवाल करते हैं.. कि

प्रश्न- आखिर “मनुष्य जीवन” के धरातल पर ये “प्रारब्ध व पुरुषार्थ” काम कैसे करते हैं..??

यदि हम थोड़ा बहुत भी अपने प्रोफाउंड स्कॉलर्स को पढ़ने में रुचि रखते हैं, तो अवश्य जानते ही होंगे.. कि डॉ.रजनीश (ओशो) ने अध्यात्म के इस जटिल पहलू को एकदम आम लोगों की भाषा में.. ‘मुहम्मद पैग़म्बर’ और उनके एक ‘अली’ नामक शिष्य के बीच होने वाले एक वार्तालाप के ज़रिए समझाने का बहुत अच्छा प्रयास किया है।

हुआ यूं कि, एकबार अली ने अपने गुरु पैग़म्बर साहब से पूछा..कि, “मनुष्य अपनी इच्छानुसार कुछ कर सकता है..या नहीं?? और यदि ‘नहीं ‘ तो फिर ‘चोरी मत करो,झूठ मत बोलो, हिंसा मत करो..इन उपदेशों का क्या प्रयोजन है..? गुरु जी! बताइए..ये सब व्यर्थ हैं ना??”

पैग़म्बर ने अली की बात का जवाब देने के बजाय अली से कहा, ‘अली! ज़रा इधर आओ..और अपना एक पैर हवा में उठाकर खड़े तो हो जाओ।

अली थोड़ा गुस्से के भाव में आ तो गया, पर वह नहीं समझ सका गुरु ये सब क्यों करवा रहे हैं..?

अली सोच रहा है कि, मैंने इतना गम्भीर सवाल पूछा है। फिर गुरु मुझ से ये क्या करवा रहे हैं। अतः गुरु की आज्ञा “सिरोधार्य के भाव” में वह अपना एक पैर हवा में उठाकर खड़ा हो जाता है।

तब गुरु ने अली से कहा, अब अपना दूसरा पैर भी हवा में उठा लो! अली आश्चर्य के साथ बोलता है !! ये कैसे सम्भव है..? गुरु जी। कोई अपने दोनों पैर भला एक साथ ऊपर कैसे उठा सकता है..?

अब पैग़म्बर विल्कुल गम्भीर मुद्रा में अली को समझाते हैं कि, जिस प्रकार पहली बार में तुम अपने किसी भी पैर को (लेफ़्ट या राइट) हवा में उठाने के लिए स्वतंत्र थे। बस, मनुष्य के पास कर्म करने के लिए सिर्फ उतनी ही ‘फ्री-विल’ (पुरुषार्थ) की चॉइस होती है।

अली ! ठीक से समझिए! जिस प्रकार मेरे आदेश में एक पैर हवा में उठाने के अलावा तुम्हारे लिए दांए / बांए का कोई निर्देश नहीं था। ठीक वैसे ही मनुष्य को अपने जीवन में किसी अमुक कार्य को करने के लिए बस इतनी सी “स्वतंत्र इच्छा” होती है।

अगले स्टेप में.. दूसरे पैर का जमीन के साथ फिक्स हो जाना.. वैसे ही उसकी ‘नियति’ बन जाती है। जैसे मनुष्य अपने द्वारा किए गए शुभ / अशुभ कर्मों से बने ‘प्रारब्ध’ वश “नियत नटी” के खेल की महज एक “कठ पुतली” बन के रह जाता है। फिर उसे वही करना होता है जो प्रारब्ध उसे करवाता है।

इसे समझने के लिए जीवन के धरातल पर आना लाज़मी है।

ठीक वैसे ही हम सबके जीवन में कुछ चीजें ऐसी होती हैं। वे पहले हमारी ‘फ़्री-विल’ के दायरे में रही होती हैं। मग़र जैसे ही हम अपनी “फ्री-विल चॉइस” यूज कर लेते हैं, तो बाकी की स्थिति फिर स्वतः ही हमारी ‘नियति’ अर्थात प्रारब्ध बन जाती है। अर्थात फिर हमारे दायरे निर्धारित हो जाते हैं।

आज न सिर्फ समझने अपितु जीवन के इस “गहन सिद्धांत” को हमें अपने आचरण में उतारने की महती आवश्यकता है। 👍

विचारक; योगेंद्र सिंह पचहरा ,मुखिया परिवार,नीमगांव….

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