190-“याज्ञवल्क्य”

👇🏻 एक बार ‘याज्ञवल्क्य’ घर बार छोड़ कर जाने लगे.. वे जीवन के अंतिम पड़ाव में थे। और अब वह चाहते है कि घर-गृहस्थी छोड़ कहीं दूर पर्वतों की गुफाओं में जाकर शांति से ध्यान लगाया जाय..

याज्ञवल्क्य जी की दो पत्नियां थीं और बहुत सारी धन-दौलत भी। मग़र वे सबकुछ छोड़-छाड़ कर जाना चाह रहे थे।

क्योंकि वे उस समय के प्रकांड पंडित थे।विद्वता में उनका कोई मुकाबला नहीं था। तर्क में तो उनकी प्रतिष्ठा बहुत ऊंची थी।

चलो, उनकी तर्क-प्रतिष्ठा के एक प्रकरण पर नज़र डालते हैं..

ऐसे मान लो कि राजा जनक ने एक ‘वाद-विवाद’ का बहुत बड़ा सम्मेलन किया और एक हजार गौएं, उनके सींग सोने से मढ़वा कर उनके ऊपर बहुमूल्य वस्त्र डाल कर महल के द्वार पर खड़ी कर दीं और कहा: कि जो पंडित सही तर्को के आधार पर हमारी सभा में सबके समक्ष अपना ‘पांडित्य’ सिद्ध करेगा, वह इन हजार गौओं को इसी अवस्था में जीतकर अपने साथ ले जा सकेगा। यही इस ‘वाद-विवाद’ के सम्मेलन को जितने का पुरस्कार होगा।

दूर-दराज से बड़े-बड़े विद्वान आकर इकट्ठे हुए..दोपहर हो गई। काफ़ी देर ‘वाद-विवाद’ भी चला। लेकिन कुछ तय नहीं हो पा रहा था कि ‘कौन जीता.?’

तभी दोपहर में याज्ञवल्क्य कहीं से अपने कई एक शिष्यों के साथ वहां आ गये। दरवाजे पर उन्होंने गौएं खड़ी देखीं,तो उन्होंने पता लगाया कि, आख़िर माज़रा क्या है..? तो ‘वाद-विवाद सम्मेलन’ और पुरस्कार में दी जाने वाली गउओं के बारे में पता चला.. लेकिन उन्होंने गौर किया कि बेचारी गायें तो सुबह से खड़ी-खड़ी बुरी तरह थक गई हैं, धूप में उनका पसीना बहने लगा है। तब उन्होंने अपने शिष्यों से कहा, ऐसा करो, तुम गौओं को हांककर घर ले जाओ, मैं राजा जनक जी के सम्मेलन को देखता हूँ।और यहां चल रहे ‘वाद विवाद’ का निपटारा करके घर आता हूं।

उनकी प्रतिष्ठा के आगे राजा जनक की भी हिम्मत नहीं पड़ी उनसे यह कहने की, कि ये क्या बात है पहले वाद-विवाद जीतो! उसके बाद गउएँ जानी चाहिए।

क्योंकि ये जीतने के बाद मिलने वाला पुरुस्कार है।

हाँ, एकाध पंडित ने तो अवश्य कहा कि यह नियम के विपरीत है..पुरस्कार पहले ही ले चले.. वाह!!! जी वाह!!!

लेकिन याज्ञवल्क्य ने कहा, मुझे खुद पर भरोसा है। तुम फिक्र न करो। विवाद तो निपट ही जायेगा।

बेचारी गौएं थक गई हैं, इन पर ज़रा तरस खाओ..!! जाने दो.. बताइए..क्या मुद्दा है…?

ज़ाहिर है वे बहुत ही प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। बहुत धन-सम्पत्ति उनके पास बहुत थीं। बड़े सम्राट उनके शिष्य थे। और जब वह सन्यास के लिए जाने लगे,तब उन्होंने अपनी दोनों पत्नियों को बुला कर कहा कि आधा-आधा धन तुम्हें बांट देता हूं। बहुत सम्पत्ति है, सात पीढ़ियों तक भी खर्च नहीं कर सकोगी।

इसलिए तुम निश्चिंत रहो, तुम्हें जीवन में कभी कोई अड़चन नहीं आएगी। और मैं अब सन्यास ले रहा हूं। अब मेरे जीवन का ये अंतिम पड़ाव है। ऐसे दिनों मैं परमात्मा के साथ समग्रता से लीन हो जाना चाहता हूँ।

मैं कोई जीवन में नया प्रपंच नहीं चाहता। अपना एक क्षण भी अब मैं किसी और बात में नहीं गंवाना चाहता।

उनकी एक पत्नी जो भौतिकवादी थी, वह तो बड़ी प्रसन्न हुई, क्योंकि वे बहुत सारा धन जो छोड़कर जा रहे थे। उसमें से आधा उसे मिलने वाला था। वह सोच रही थी अब मैं ख़ूब मजे करूंगी।

लेकिन दूसरी पत्नी जो अध्यात्मवादी थी उसने सारा दृश्य-परिदृश्य ही बदल दिया.. कहा कि इसके पहले कि आप जाएं, मेरे एक प्रश्न का उत्तर दे ते जाइये ..

क्या इस धन से आपको डालने जीवन में शांति,आनन्द एवं परमात्मा मिला..?

अगर मिल गया है,तो फिर कहां जाते हो..? और यदि नहीं मिला है, तो ये कचरा मुझे क्यों पकड़ाये जा रहे हो..? फिर मैं ही इसे लेकर क्या करूंगी..? चलो, मैं,भी तुम्हारे साथ चलती हूं।

जिन्हें कभी कोई निरुत्तर न कर सका आज वही याज्ञवल्क्य जी ‘नारी-शक्ति’ के सामने अपने जीवन में पहली बार निरुत्तर खड़े हैं। वे सोच रहे हैं कि,अब इस स्त्री को क्या कहे..? यदि ये कहे कि नहीं मिला, तो फिर कहेगी कि, धन बांटने में इतनी अकड़ क्यों दिखा रहे हो..? बांटते वक़्त हम ये अभी भी कह रहे थे कि, देखो इतने हीरे-जवाहरात, इतना सोना, इतने रुपये, और विस्तार की हुई सारी ज़मीन ये सब आपको दिए जा रहा हूँ। क्या किसी पति ने अपनी पत्नी के लिए इतना धन कभी दिया है..?

उस क्षण मुझमें वाक़ई थोड़ा अहंकार तो आ ही गया था।

मग़र दूसरी विद्वान पत्नी ने उनके सारे अहंकार पर पानी फेर दिया। उसने पुनः कहा ये उलझन हमें क्यों दिए जाते हो? अगर तुम इससे परेशान होकर सन्यास ले रहे हो तो ज़ाहिर है आज नहीं,तो कल हमें भी ऐसा ही कुछ करना पड़ेगा। तो फिर ‘कल’ ही क्यों..? ‘आज’ क्यों नहीं..? मैं भी तुम्हारे साथ चलती हूं।

तो यहां सांसारिक धन जो बांट रहा है वह क्या खाक बांट रहा है! उसके पास कुछ और मूल्यवान नहीं है। शायद इसीलिए बांट रहा है। कोई ज्ञान बांट रहा है, पाठशालाएं खोल रहा है, धर्मशास्त्र समझा रहा है, जब तक किसी ने स्वयं ध्यान और समाधि में डुबकी नहीं लगाई है, तो वह भी केवल ‘कचरा’ ही बांट रहा है। उसका कोई मूल्य नहीं है। बांटने योग्य यदि कुछ है तो सिर्फ: “परमात्मा” और उसकी अनुकरणीय बातें जिन पर हमें सदैव अडिग रहना चाहिए। और इसके अलावा कुछ भी नहीं है। वो भी उसे कोई तभी बांट सकता है जब पहले स्वयं पा ले, जान ले और जी..कर देख ले।उससे पहले नहीं।👍

सदैव प्रसन्न रहिये और स्वस्थ रहिए..दरअसल, “जो ‘प्राप्त’ है, मेरे ख़्याल से वही ‘पर्याप्त’ है।।” 🙏🙏🙏 👍👍

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