🕉️अटूट विश्वास🕉️
हालांकि, हमारे कई एक जन्मों के कर्म-संस्कारों से निर्मित “प्रारब्ध” को आधार मानते हुए.. “हानि,लाभ,जीवन,मरण,यश और अपयश” का निर्धारण होता है।
मग़र इन छह चीजों पर ‘निर्णय’..देने का अधिकार परमसत्ता ने अपने हाथ में रखा है।
इससे कोई सरोकार भी नहीं है कि इस तथ्य में कौन कितनी सहमति रखता है..? ये सार्वभौमिक सत्य जो है।
जी,हाँ आधुनिक भाषा में वहीं दूर.. अपने गौलोक धाम से नियंत्रित करने का रिमोट राधे गोविंद के हाथ में है।
अपने एक दोहे के मध्य से तुलसीदास जी ने भी इसकी पुष्टि की है….
” सुनहुँ भरत भावी प्रबल, बिलखि कहहुँ मुनिनाथ।
हानि,लाभु, जीवनु,मरणु, यश,अपयश विधि हाथ।।”
” विधि” यानी गोविंद ..
क्योंकि हमारे कई एक जन्मों के संचित कर्मों व संस्कारों से बुना हुआ ताना-बाना जो अध्यात्म की भाषा में “प्रारब्ध” अर्थात आत्मा में निहित एक स्थायी खाते की तरह है जिसमें ‘जीव’ के कई एक जन्मो का हिसाब-किताब होता है।
मग़र उसे समझकर निर्णय करने की सामर्थ्य व हक़ केवल और केवल गौलोक-धाम के परमसत्ता धारी यानि ‘राधे-गोविंद’ का ही है।
मानवता के दायरे में रहने वालों को कभी न कभी अपने जीवन में ऐसा अनुभव अवश्य होता ..
लेकिन चलो! इस बात को एक कहानी के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं..
एकबार की बात है..
अचानक रात के ढाई बजे एक सेठ की नींद खुल गयी..जबकि उसे स्वास्थ्य-सम्बन्धी कोई परेशानी नहीं थी। मगर वह एक अजीब बेचैनी महसूस कर रहा था।। वह अपने घर में चक्कर पर चक्कर लगाये जा रहा था, पर कुछ भी समझ नहीं आ रहा था..मन की इसी धुना-बुनी में वह थक कर कोठी के नीचे वाले माले यानि ग्राउंड फ्लोर पर उतर आया, न तो उसे घर में किसी को जगाने का मन हुआ,न ड्राइवर को .. वश कार निकाली। और.. शहर की सड़कों पर वह निकल गया..
तभी रास्ते में उसे एक मंदिर दिखा, सोचा थोड़ी देर इस मंदिर में जाकर भगवान के पास बैठता हूँ। शायद मन को कुछ तसल्ली मिले। वह सेठ मंदिर के अंदर गया तो देखा, एक और आदमी वहां पहले से ही भगवान के सामने नतमस्तक है। लेकिन उसका चेहरा बहुत उदास था।
सेठ ने पूछा “क्यों भई इतनी रात को मन्दिर में क्या कर रहे हो ?” उस अजनबी ने कहा, महोदय! “मेरी पत्नी अस्पताल में है, वह दर्द से चीख रही है। सुबह यदि उसका आपरेशन नहीं हुआ तो वह मर जायेगी अब मेरे पास प्रभु से गुहार लगाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता ही नहीं है। क्योंकि रिश्तेदारों से पहले ही मदद ले चुका हूँ।
गोविंद कृपा से उसकी बात सुनकर सेठ ने बिना किसी लाग-लपेट के अपनी जेब में उस वक़्त जितने रूपए थे, तुरन्त खुशी-खुशी सब उस परेशान-व्यक्ति को सौंप दिए। न जाने क्या हुआ..? उस गरीब आदमी के चेहरे की मुस्कान के जादू से सेठ की बेचैनी एमदम से फुर्र हो गयी।
सेठ ने अपना कार्ड देते हुए कहा इसमें फोन नम्बर और पता भी है और जरूरत हो तो नि:संकोच बोल दीजियेगा।
उस गरीब आदमी ने कार्ड न लेते हुए बड़ी विनम्रतापूर्वक कहा, “मेरे पास उनका पता है और उनके पास आप जैसे फ़रिस्तो का.. तो सेठ जी अपना एक कार्ड ही क्यों खराब करते हो!!”
सेठ ने कहा, “किसका पता है आपके पास..?”
उस गरीब आदमी ने अपने ‘अटूट-विश्वास’ के कॉन्फिडेंस में कहा, “जिसने मेरी करुण पुकार सुनकर रात को ढाई बजे अपने प्रिय भक्त..”सेठ जी ” आपको यहां मेरी मदद के लिए भेजा है। उसी ‘राधे गोविंद’ का पता है मेरे पास।”
आस्थावान लॉबी सदैव ये निर्देश देती आयी है कि, यदि व्यक्ति में किसी के प्रति भी ऐसा “अटूट विश्वास” है, तो उसके सारे कार्य समय से पूरे होते चले जाते हैं।’
यदि कभी ईश्वर से कुछ चाहें तो केवल ‘सदबुद्धि और ख़ुद को सदैव मानवता के दायरे में बने रहने का आशीर्वाद’। और कुछ नहीं। इसी में दुनियाँ का सारा तत्व समाहित है। और “तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा..” वाले भाव से प्रतिदिन अपने सारे कर्म उस परमसत्ता को समर्पित करते चलें जाएं.. मेरे ख्याल से यही जीवन का सद्मार्ग है।
हमेशा स्वस्थ रहिए और मस्त रहिए..
शिक्षा :
धीरे-धीरे अभ्यासगत होकर अपने ईष्ट के प्रति हमें भी अपने अंदर श्रद्धा के साथ वही अजनबी व्यक्ति वाला “अटूट विश्वास” पैदा करने का प्रयास करना चाहिए …
‘राधे गोविंद’ 👍
यदि कभी ईश्वर से कुछ चाहें तो सदैव केवल सदबुद्धि और ख़ुद को मानवता के दायरे में बने रहने की ही चाह रखें, और कुछ नहीं। इसी में दुनियाँ का सारा तत्व समाहित है। और सदैव अपने सारे कर्म ईश्वर रूपी परमसत्ता को समर्पित करते चले जाएं..
👍
It’s true
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जी,विल्कुल👍
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सच ही कहा है विश्वास ईश्वर के प्रति हमारी सोच चेतना को मजबूत करता है
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