जब शहीद भगत सिंह अंग्रेजों की कैद में थे। तब उनकी बैरक की साफ-सफाई करने वाले सफाई-कर्मी को छुआछूत फैलाने वाले समाज के ठेकेदार एक भद्दी गाली की तरह ऐसे भले मानुष को “भंगी” जैसे शब्द बोल कर बेइज्जत करते थे। उसे ही उसकी जाति बताते..जबकि उसका अपना नाम ‘बोघा’ था।
भगत सिंह उसको बेबे (मां) कहकर बुलाते थे। जब कोई पूछता कि भगत सिंह ये भंगी ‘बोघा’ तेरी बेबे कैसे हुआ? भई!! तब भगत सिंह बोलते, ‘मेरा मल-मूत्र या तो मेरी बेबे ने साफ़ किया था जब में छोटा बालक था। या आज इस बैरक में ये भला पुरूष बोधा उठाता है।
इसलिए बोधा मे, मैं अपनी बेबे यानि मां को देखता हूं। यू तो मेरी बेबे ही है। यह कहकर भगत सिंह बोधा को अपनी बाहों में भर लेता। भगत सिंह जी अक्सर बोघा से कहते, बेबे मैं तेरे हाथों की रोटी खा वांगा। पर बोघा अपनी जाति को याद करके झिझक जाता और कहता, भगत सिंह तू ऊँची जात का सरदार, और मैं एक अदना सा भंगी, “मेरे वीर भगतां तू रेंण दे, ज़िद न कर।”
सरदार भगत सिंह भी अपनी ज़िद के पक्के थे, फांसी से कुछ दिन पहले जिद करके उन्होंने बोधा को कहा,” ए ! बेबे अब तो तेरा लाल चंद दिनों दा मेहमान सी, अब तो इच्छा पूरी कर दे!” ये सुणके बोधा की आँखों से आंसू बह चले। रोते-रोते उसने खुद अपने हाथों से उस “वीर शहीद ए आजम” के लिए रोटिया पकाई, और अपने हाथों से ही खिलाई। भगत सिह के मुंह में रोटी का ग्रास डालते ही बोधा की रुलाई फूट पड़ी। “ओए भगतां, ओए! मेरे शेरा, धन्य है तेरी मां, जिसने तुझ जैसे लाल कूँ जन्मा.. भगत सिंह ने बोधा को अपनी बाहों में भर लिया।
ऐसी सोच के धनी थे आपणे “वीर सरदार भगत सिंह जी..” परन्तु आजादी के सत्तर साल बाद भी हम भारतीय समाज में व्याप्त लोगों के रग-रग में ऊँच-नीच के भेद-भाव के विचार को दूर करने के लिये ऐसा कुछ न कर पाए जो 88 साल पहले ‘सरदार भगत सिंह’ करके चले गए।
ऐसे महान ‘शहीदे आजम’ श्रीमान भगतसिंह जी को हम सभी भारतीय नागरिकों का शत शत नमन है। जय हिंद जय भारत।👍
विचारक ; युग पचहरा, नीमगाँव, राया, मथुरा।