एक ऐसी सत्य कथा जिसको पढ़ने के बाद शायद.. आपके जीने का अंदाज़ बदल जाय..
सुनिए.. दक्षिण अफ्रीका में 1994 से पूर्व रंगभेद की नीति (Apartheid) से राज-काज चलता था.. यानी काले लोगों के लिए अलग कानून और गौरे लोगों के लिए अलग..
‘नेल्सन मंडेला’ काले रंग के यानी वंचित समाज के नागरिक थे। जैसे ही उन्होंने होश सम्भाला अपने अधिकारों की आवाज उठायी और तत्कालीन सरकार से समानता का अधिकार मांगा, तो नेल्सन मंडेला को 1964 में न केवल जेल में डाल दिया गया वल्कि बहुत ही क्रूर व अमानवीय यातनाओं को लगभग 30 वर्ष (एक लम्बे अर्से) तक सहना पड़ा। तब कहीं जाकर उनकी और उनके लोगों की विजय हुई,जिससे दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की षड्यंत्रकारी नीति का खात्मा हुआ। और नेल्सन मंडेला 1994 में अफ्रीका के पहले लोकतांत्रिक व अश्वेत राष्ट्रपति बने।
इसी वर्ष 1994 में प्रदेश की A ग्रेड संस्था “के.एल.जैन इंटर कॉलेज, सासनी” अर्थात मेरे सपनों के मन्दिर में मुझे भी एक पुजारी (शिक्षक) के रूप में तैनाती मिली थी। तारीख़ सहित वो मंजर मुझे आज भी बहुत अच्छी तरह याद है। 10 मई को श्री मंडेला साहब ने अंतरराष्ट्रीय लीडरशिप के सामने शपथ ली थी।
दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति बनने के बाद.. नेल्सन मांडेला.. एकदिन अपने सुरक्षा कर्मियों के साथ एक होटल में खाना खाने पहुंचे । सबने अपनी अपनी पसंद का खाना आर्डर किया और..फिर खाना आने का इंतजार करने लगे । उसी समय.. मंडेला की सीट के ठीक सामने एक व्यक्ति भी बैठा खाने का इंतजार कर रहा था ।
मांडेला ने उसे पहचान लिया..और अपने सुरक्षा कर्मी से कहा कि उसे भी अपनी टेबल पर बुला लो। ऐसा ही हुआ। उस बुलावे को राष्ट्रपति का आदेश समझ वह आ तो गया। मग़र खाना खाते हुए उसके हाथ कंपकपा रहे थे । खाना खत्म कर वो आदमी सिर झुका कर बहुत जल्दी रेस्तरां से बाहर चला गया।
उस आदमी के जाने के बाद मंडेला के सुरक्षा अधिकारी ने कहा कि, वो व्यक्ति शायद बहुत बीमार था , खाते वख़्त न केवल उसके हाथ लगातार कांप रहे थे,वल्कि वह ख़ुद भी कांप रहा था । मांडेला ने कहा नहीं ऐसा नहीं है । वह बीमार नहीं था। वह उसी जेल का जेलर था, जिसमें मुझे 30 वर्ष कैद में रखा गया था । और जब मुझे यातनाएं दी जाती थीं और मै.. कराहते हुए..पानी-पानी बोलता, तो ये जेलर आकर मेरे ऊपर पिशाब करता था ।
मांडेला ने कहा मै, अब राष्ट्रपति बन गया हूं , उसने समझा होगा कि..शायद मै भी उसके साथ वैसा ही कोई दुरव्यवहार करूंगा । पर नहीं, मेरा चरित्र ऐसा नहीं है । मैं ऐसा मानता हूँ.. बदले की भावना से काम करना..व्यक्ति को विनाश की ओर ले जाता है । जबकि धैर्य और सहनशीलता हमें सदैव विकास की ओर ले जाती है।
धन्यवाद 👍
विचारक ; युग पचहरा,
शिक्षक, जैन इंटर कॉलेज, सासनी,हाथरस