183-सामर्थ्य

अ——ज्ञ

हिन्दी वर्णमाला के अक्षरों ‘अ से ज्ञ ‘ के क्रम में एक कवितामय प्रयोग..करने के प्रयास के साथ-साथ ‘मानव-जाति’ को एक सन्देश देने की कोशिश भर है उसे समझकर..हमें आज ‘विश्व हिंदी दिवस’ पर ईश्वर प्रदत्त ‘ज़िंदगी’ को वही आकर देने का संकल्प लेना चाहिए..जिसके लिए वह सदैव से वांछनीय है…👍

अ चानक एकदिन

आ कर मुझ से

इ ठलाता हुआ एक पंछी बोला!

ई श्वर ने मानव को

उ त्तम ज्ञान-दान से तौला ।।

ऊ पर हो तुम सब जीवों में

ऋ ष्य तुल्य अनमोल हो तुम।

ए क अकेली जात अनोखी फिर भी

ऐ सी क्या मजबूरी तुमको,

ओ ट रहे होंठों की शोख़ी

औ र सताकर कमज़ोरों को।

अं ग तुम्हारा खिल उठता है

अ: तुम्हें क्या मिल जाता है.? मानव ने

क हा उसे भटकाते हुए ..कहो!

ख ग आज पूरे

ग र्व से कि- इस अभाव में भी

घ र तुम्हारा बड़े मजे से

च ल रहा है।

छो टी सी- टहनी के सिरे की

ज गह, बिना किसी

झ गड़े के,।

न ही किसी

ट कराव के तुम्हारा पूरा कुनबा पल रहा है।

ठौ र यहीं है उसमें

डा ली-डाली, पत्ते-पत्ते

ढ लता सूरज

त रावट देता है

थ कावट सारी, पूरे दिवस की-तारों की लड़ियों से

ध न-धान्य की लिखावट लेता है

ना दान-नियति से अनजान अरे!

प्र गतिशील मानव!

फ़ रेब के पुतले

ब न बैठे हो तुम, अपनी “सामर्थ्य”

भ ला कहाँ याद तुम्हें!

म नुष्यता का अर्थ भूले मानव!

य ह थी, प्रभु की एक अनुपम

र चना जिसे तुमने अपने…

ला लच,लोभ के

व शीभूत होकर

श र्म-धर्म सब तजकर

ष ड्यंत्रों के खेतों में

स दा पाप-बीजों को बोकर हो कर स्वयं से दूर .. क्यों तुम ..?

क्ष णभंगुर सुख में अटक हर तरफ

त्रा हि-त्राहि मचवाते हो .. अरे! मानव, अपनी “सामर्थ्य ” भूल तुम

ज्ञा न-पथ से भटक गए हो..?😢😢😢

🕯️🕯️🕯️’हिंदी-भाषा’ के बारे में मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि, व्यक्ति के मन के भाव जो “हिंदी भाषा” अभिव्यक्त कर पाती है। उतनी “सामर्थ्य” अन्य किसी भाषा में है मुझे नहीं लगता ।

हालांकि, मैं ‘अंग्रेजी ‘ का शिक्षक हूँ..मग़र हिंदी की ‘भावनात्मकता’ मुझे सदैव आकर्षित करती है। 👍

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