अ——ज्ञ
हिन्दी वर्णमाला के अक्षरों ‘अ से ज्ञ ‘ के क्रम में एक कवितामय प्रयोग..करने के प्रयास के साथ-साथ ‘मानव-जाति’ को एक सन्देश देने की कोशिश भर है उसे समझकर..हमें आज ‘विश्व हिंदी दिवस’ पर ईश्वर प्रदत्त ‘ज़िंदगी’ को वही आकर देने का संकल्प लेना चाहिए..जिसके लिए वह सदैव से वांछनीय है…👍
अ चानक एकदिन
आ कर मुझ से
इ ठलाता हुआ एक पंछी बोला!
ई श्वर ने मानव को
उ त्तम ज्ञान-दान से तौला ।।
ऊ पर हो तुम सब जीवों में
ऋ ष्य तुल्य अनमोल हो तुम।
ए क अकेली जात अनोखी फिर भी
ऐ सी क्या मजबूरी तुमको,
ओ ट रहे होंठों की शोख़ी
औ र सताकर कमज़ोरों को।
अं ग तुम्हारा खिल उठता है
अ: तुम्हें क्या मिल जाता है.? मानव ने
क हा उसे भटकाते हुए ..कहो!
ख ग आज पूरे
ग र्व से कि- इस अभाव में भी
घ र तुम्हारा बड़े मजे से
च ल रहा है।
छो टी सी- टहनी के सिरे की
ज गह, बिना किसी
झ गड़े के,।
न ही किसी
ट कराव के तुम्हारा पूरा कुनबा पल रहा है।
ठौ र यहीं है उसमें
डा ली-डाली, पत्ते-पत्ते
ढ लता सूरज
त रावट देता है
थ कावट सारी, पूरे दिवस की-तारों की लड़ियों से
ध न-धान्य की लिखावट लेता है
ना दान-नियति से अनजान अरे!
प्र गतिशील मानव!
फ़ रेब के पुतले
ब न बैठे हो तुम, अपनी “सामर्थ्य”
भ ला कहाँ याद तुम्हें!
म नुष्यता का अर्थ भूले मानव!
य ह थी, प्रभु की एक अनुपम
र चना जिसे तुमने अपने…
ला लच,लोभ के
व शीभूत होकर
श र्म-धर्म सब तजकर
ष ड्यंत्रों के खेतों में
स दा पाप-बीजों को बोकर हो कर स्वयं से दूर .. क्यों तुम ..?
क्ष णभंगुर सुख में अटक हर तरफ
त्रा हि-त्राहि मचवाते हो .. अरे! मानव, अपनी “सामर्थ्य ” भूल तुम
ज्ञा न-पथ से भटक गए हो..?😢😢😢
🕯️🕯️🕯️’हिंदी-भाषा’ के बारे में मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि, व्यक्ति के मन के भाव जो “हिंदी भाषा” अभिव्यक्त कर पाती है। उतनी “सामर्थ्य” अन्य किसी भाषा में है मुझे नहीं लगता ।
हालांकि, मैं ‘अंग्रेजी ‘ का शिक्षक हूँ..मग़र हिंदी की ‘भावनात्मकता’ मुझे सदैव आकर्षित करती है। 👍