एक बेरोजगार युवा की आप बीती..
ये हम सभी बड़ी अच्छी तरह जानते ही हैं कि, किशोरावस्था से लेकर जवानी की शुरुआत के दिनों में व्यक्ति के ज़हन में जोश का प्रतिशत बहुत अधिक एवं होश का प्रतिशत बहुत कम होता है।
मग़र ईश्वर-प्रदत्त (God-gifted) “जीवन”.. को जिंदगी का आकार देने के लिए किया गया संघर्ष..व्यक्ति को मैच्योर बनाता है। तब.. होश का प्रतिशत दिन प्रतिदिन बढ़ता है..और फिर जोश भी अपने सीमित दायरे में स्थायी होने लगता है। जिससे धीरे-धीरे..’होश और जोश’ के बीच उचित टाइमिंग एवं संतुलन के साथ व्यक्ति समाज की नजरों में भी अच्छी सूझ-बूझ वाली छबि लेकर उभरता है।
हाँ, तो अब उस युवक की जुबानी सुनियेगा कि, उसने क्या..किया..?
: एक दिन मुझे लगा मेरे सब्र की बस इंतहा हो गयी..बड़े गुस्से से मैं घर से निकल पड़ा ..
इतना गुस्सा था की जल्दी-जल्दी में भूल से पापा वाले जूते पहन आया.. ख़्याल आ रहा था आज बस घर छोड़ दूंगा, और तभी लौटूंगा जब कुछ बन जाऊंगा …एक मोटर साइकिल तक नहीं दिलवा सकते, तो मुझे इंजीनियर बनाने के सपने ही क्यों देखतें है …..??
मैं पापा का पर्स, तो जानबूझ कर उठा लाया था …. इसे किसी को हाथ तक न लगाने देते थे …देखुंगा आख़िर इसमें क्या-क्या छुपा के रखते हैं। मुझे पता है इस पर्स मैं जरुर पैसो के हिसाब की डायरी होगी …. पता तो चले कितना माल छुपाया है ….
मुझे तो मुझे… माँ को भी अंधेरे में रखते हैं … जैसे ही मैं कच्चे रास्ते को पार कर.. पक्की सड़क पर आया, मुझे लगा जूतों में कुछ चुभ रहा है …. मैंने जूता उतार कर देखा …..तो मेरी एडी से थोडा सा खून भी रिसने लगा था … जूते की कोई कील निकली हुयी थी, दर्द तो हुआ पर तहस में जो था….
उस वक्त बस घर से बहुत दूर चले जाने के अलावा कुछ सूझ नहीं रह था …इसलिए चलता रहा.. कुछ दूर चला ही था कि, दूसरे पांव में गीला-गीला सा लगा, वहां सड़क पर पानी फैला हुआ था …. गीला वाला पैर उठा के देखा तो जूते का सोल यानी निचला हिस्सा चटका हुआ था ….. जैसे तेसे उन बेकार से जूतों से लंगडाकर बस स्टॉप तक पहुंचा।
वहां जाकर पता चला बस तो अभी-अभी गयी है..दूसरी बस लगभग एक घण्टे बाद जाएगी ….. मैंने सोचा क्यों न तब तक पापा के इस सीक्रेट पर्स की तलाशी ही ले लूँ …. मैंने पर्स खोला, एक पर्ची मिली, लिखा था.. लैपटॉप के लिए 40 हजार रु किसी साथी से उधार लिए हुए हैं.. पर लैपटॉप तो घर मैं मेरे पास है.. ? ओ आई सी..!!
दूसरा एक मुड़ा हुआ सा कागज देखा, उसमे उनके ऑफिस के किसी ‘हॉबी डे’ पर लिखा एक आर्टिकल था, मैंने जल्दी-जल्दी में सरसरी नज़र से पढ़ा,तो पापा ने अपनी हॉबी लिखी थी, जीवन में शानदार एवं चमकदार.. अच्छे जूते पहनना। ओह….अच्छे जुते पहनना ??? पर उनके जुते तो ………..!!!! ओ ! सि ड!!
मेरी बेहोशी जाती रही..अब मुझे याद आया. माँ पिछले चार महीने से पापा से हर पहली तारीख़ को बोलतीं नए जुते ले लो … और वे हर बार कहते “अभी पॉकेट टाइट है 6 महीने बाद देखता हूँ ..” अब मेरा ज़मीर जाग गया था.. ……
तीसरी पर्ची ……….मिली पुराना स्कूटर दे जाइये.. एक्सचेंज में नयी मोटर साइकिल ले जाइये …!! पढ़ते ही दिमाग घूम गया….. मैं वहीं से पापा-पापा.. कहकर चिल्लाया …………. ओह्ह्ह्ह..स्कूटर!!
मैं घर की ओर भागा…….. अब जूतों की कील-वील सब भूल गया …. मैं घर पहुंचा ….. घर पर न पापा थे न उनका स्कूटर था………….. ओह्ह्ह नही.. मैं समझ गया कहाँ गए …. होंगे ।
मैं दौड़ा ….. और मोटर-बाइक की एजेंसी पर पहुंचा…… पापा वहीँ थे …………… मैं उनके गले से लिपट गया और प्रायिश्चित के आंसुओ से उनका कन्धा भिगो दिया.. “नहीं…पापा नहीं…….. मुझे मोटर साइकल नहीं चाहिए ..अब मैं घर के हालात समझ गया हूँ.. बस आप नए जुते ले लो ..और घर चलो.. “
आज के समय की मांग के मुताबिक मैं,मेरे तरीके व आपकी सूझ-बुझ के सही मार्गदर्शन से अब कुछ बड़ा करके ही दम लूंगा।।
साथियों!! यहां मेरा अपना अनुभव ये कहता है कि,
“माँ” एक ऐसी बैंक है जहाँ आप हर भावना और अपना दुःख जमा कर सकते हो..
मग़र
“पिता” एक ऐसा क्रेडिट कार्ड है जिनके पास बैलेंस न होते हुए भी बच्चों के सपने पूरे करने की भरपूर “कोशिश” होती है…”
इंडियन-फैमिलीज़..💐 को समर्पित ‘एक विचार’..👍