181 स्वर्णिम-काल

यानी ‘GOLDEN-ERA’

अगर हमारे अंदर थोड़ी बहुत भी देशभक्ति है, तो जिसकी वजह से आज हमारा वजूद है, ऐसे व्यक्तित्व को हमें, हरगिज़ नहीं भुलना चाहिए.. ये उस डाउन टू अर्थ पर्सनैलिटी..की ही क्षमता थी जो “भारत को सोने की चिड़िया” बना पाया!! अपनी संस्कृति से ओतप्रोत वह ऐसे राजा थे जिनके राजगद्दी पर बैठने के बाद सदैव उनकी जिव्हा पर माँ शारदे का वास रहता था..इसलिए हमेशा उनके श्रीमुख से “देववाणी” ही निकलती थी l और उसी “देववाणी” से,समस्त भारत में ‘पूर्णन्याय’ होता था..इसीलिए इतिहास दुनियाँ के सबसे न्याय प्रिय राजा के रूप में उनकी सराहना करता है। ध्यान रहे यही वह एकमात्र राजा हैं जिनके राज्य में अधर्म का “संपूर्ण नाश” हो गया था।

कौन होगा जो ऐसे वंदनीय,अनुकरणीय महाराजा “विक्रमादित्य” की ‘जजमेंट सीट ऑफ विक्रमादित्य’ के चमत्कार के बारे में नहीं जनता होगा। उनकी ईमानदारी व ‘न्यायप्रियता’ को मेरा शत शत नमन है।

मग़र बड़े ही दुख की बात है,कि देश “महाराज विक्रमादित्य” की उपेक्षा कर अनदेखी कर रहा है। आज देश का ध्यान व ज्ञान उनके बारे में लगभग “शून्य के बराबर” हो के रह गया है। जिसकी जिम्मेदार देश व प्रदेश स्तर पर बनी शिक्षा-जगत की “पाठ्यक्रम-निर्धारण समितियाँ है।

एक वाज़िब सवाल..?

जिन्होंने भारत को सोने की चिड़िया अर्थात हर क्षेत्र में सम्पन्न बनाया, और देश में “स्वर्णिम काल” स्थापित किया ऐसे प्रेरणादायक व्यक्तित्व को हमने विद्यालयी-पाठ्यक्रमों से अलग-थलग क्यों कर रखा है..?

● चलो इनका इतिहास जान लेते हैं.. उज्जैन में एक राजा थे.. गन्धर्वसैन , जिनके तीन संताने थी। सबसे बड़ी लड़की थी l मैनावती , उससे छोटा लड़का भृतहरि और सबसे छोटा बेटा वीर विक्रमादित्य..l अर्थात स्वयं। बहन मैनावती की शादी धारानगरी के राजा “पदमसैन” के साथ कर दी गयी l जिनके एक पुत्र हुआ गोपीचन्द l आगे चलकर गोपीचन्द ने “श्री ज्वालेन्दर नाथ जी” से “योग दीक्षा” ली l और “तपस्या करने जंगलों में चले गए”..l फिर मैनावती ने भी, “श्री गुरू गोरक्ष नाथ जी से योग दीक्षा ले ली”।

● मत भूलिए..! आज ये देश और यहाँ की “संस्कृति” केवल, “विक्रमादित्य” के कारण, “अस्तित्व” में है। अशोक मौर्य ने “बोद्ध धर्म” अपना लिया था l और फिर बोद्ध बनकर 25 साल राज किया था। उस वक्त भारत में “सनातन धर्म”, लगभग “समाप्ति” पर आ गया था l देश में -“बौद्ध और अन्य का बोलबाला था।

● “रामायण, और महाभारत” जैसे “ग्रन्थ” भी लगभग खो से गए थे l “महाराज विक्रम” ने ही, पुनः उनकी “खोज “करवा कर, दोनों ग्रन्थों को पुनः”स्थापित” किया। उन्होंने ही “विष्णु और शिव जी” के “मंदिर” बनवाये l और “सनातन धर्म” को अपनी सामर्थ्य से “बचाया” l विक्रमादित्य के 9 रत्नों में से एक -“कालिदास” थे जिन्होंने “अभिज्ञान शाकुन्तलम्” लिखा। जिसमें भारत का इतिहास है l अन्यथा काफी वक्त तक भारत का इतिहास ही नहीं बन्धुवर ! उस वक़्त हम “भगवान् श्री कृष्ण और राम ” को ही, खो (भूल )चुके थे। हमारे ग्रन्थ तो अपने ही देश..भारत में खोने के कगार पर आ गए थे।

● उस समय -“उज्जैन के राजा भृतहरि” ने राज छोड़कर, श्री गुरू गोरक्ष नाथ जी से योग की दीक्षा ले ली l और “तपस्या” करने जंगलों में चले गए l राज अपने छोटे भाई – “विक्रमादित्य” को दे दिया. I “वीर विक्रमादित्य” भी ,श्री गुरू गोरक्ष नाथ जी से -“गुरू दीक्षा” लेकर, “राजपाट सम्भालने लगे” तब कहीं जाकर सनातन धर्म बच सका। और हमारी “संस्कृति” भी बच पायी।

● “महाराज विक्रमादित्य” ने केवल धर्म ही, नही बचाया ? उन्होंने देश को आर्थिक तौर पर इतना सम्पन्न बनाया..जिसे लोग “सोने की चिड़िया” कहने लगे..और यही भारत का वो राज है जिसे “भारत का स्वर्णिम काल” या राज कहा जाता है।

● “विक्रमादित्य” के इस काल में भारत का कपडा, विदेशी व्यपारी, “सोने के वजन” से खरीदते थे। “भारत में इतना सोना आ गया था”…, कि “विक्रमादित्य काल” में – “सोने के सिक्के” प्रचलन में थे। हाँ, “गूगल इमेज” करके …,”विक्रमादित्य-काल” के “सोने के सिक्के” आप भी देख सकते हैं।

● “कैलंडर”, पर व महापुरुषों की जीवनी व ऐतिहासिक तारीख़ में आप जो – “विक्रम संवत” लिखा देखते हो. उसकी शुरुआत भी, राजा वीर विक्रमादित्य जी के जन्म से हुई है.. आज जो भी, “ज्योतिष गणना” है ? जैसे , हिन्दी सम्वंत , वार , तिथियां , राशि , नक्षत्र , गोचर ,आदि सब भी उन्ही की रचना है l वे बहुत ही, पराक्रमी , बलशाली, और बुद्धिमान, राजा थे। “विक्रमादित्य” के काल में हर “नियम” ,”धर्मशास्त्र” के हिसाब से बने होते थे। न्याय , राज, सब “धर्मशास्त्र” के नियमो पर चलता था। “विक्रमादित्य” का काल, “प्रभु श्रीराम जी के राज के बाद सर्वश्रेष्ठ माना गया है”l जहाँ :- “प्रजा”, “धनी” होने के साथ-साथ किसी भी स्थिति में धर्म से नहीं डिगती थी”।

◆बड़े दुःख की बात है ,कि, ” भारत के सबसे महानतम राजा” “विक्रमादित्य” के बारे में हमारे स्कूलों /कालेजों मे आज कोई “स्थान” नहीं रह गया है। कैसी विडंबना है..भारत देश के नौनिहालों को होश सम्भालते ही अकबर, बाबर, औरंगजेब, जैसै – “दरिन्दो” का “इतिहास” पढाया जा रहा है।

निवेदन: मेरा इस विषय पर ब्लॉग लिखने का एकमात्र उद्देश्य यही है कि,”हमारी वास्तविक-संस्कृति का ज्ञान”, “हमारी आने वाली पीढ़ियों को..बना रहे

🙏 जय हिन्द। जय भारत। मेरा एक कदम सनातन की ओर..🙏

विचारक..; युग पचहरा, नीमगाँव, राया,मथुरा

Leave a comment