मत,विचार,राय या फिर मशविरा..ये सब लगभग एक दूसरे के पर्याय तो हैं ही।
मत अर्थात विचार..
लोगों के बीच ‘मतभेद’ होना कोई बड़ी बात नहीं, क्योंकि विचार धाराएं हमेशां ‘पर्सन टू पर्सन डिफ्रेंसियेट’ होती हैं। लेकिन यदि मन में किसी के प्रति कोई द्वेष या भेद घर कर जाए तो वह धीर-धीरे ग्रंथि बन जाती है जो गलत है। वही एकदिन ‘मनभेद’ का रूप ले लेती है उससे सदैव दूर रहना होगा।
एक ऑथेंटिक रिपोर्ट के आधार पर दुनियाँ के लगभग अस्सी फीसदी लोग इस ‘मनभेद’ नामक भयंकर बीमारी के शिकार होते हैं।
एक और बात जहाँ ‘समर्थन’ या ‘विरोध’ के स्वर सुनाई पड़ते हैं, ज़ाहिर सी बात है वहाँ ‘वैचारिक मतभेद’ होते हैं।
मग़र आप गौर कीजियेगा जब कभी भी किसी अमुक व्यक्ति के विरोध या फिर समर्थन में ऐसे स्वर उठते हैं..उस वक्त वह बन्दा रिएक्ट ऐसे करता है..जैसे कि व्यक्तिगत समर्थन या विरोध उसी का हो रहा है क्या। जबकि धरातल पर ऐसा है नहीं।
मेरी राय में तो विरोध या समर्थन कभी किसी ‘व्यक्ति’ का होता ही नहीं है, ये तो सदैव किसी अनुपयुक्त या अनसुईटेबल ‘सोच’ का हुआ करता हैं।
इसीलिए तो कहा जाता है कि, “घृणा सदैव अपराध से करो अपराधी से नहीं।”
अच्छा ये भी जरूरी नहीं कि,”व्यक्ति के विचार व सोच का पैरामीटर हर समय उचित ही काम करे। समाज में अच्छी छबि वाला व्यक्ति भी दूषित वातावरण के कारण.. पूर्वाग्रह से ग्रसित होने पर अपने गलत विचार-प्रभाव से.. किसी सन्दर्भ में अनुचित बात कर सकता है.. ठीक वैसे ही निहायत अनसमझ कहे जाने वाले व्यक्ति का विचार सही हो सकता है।
मेरे ख़्याल से व्यक्ति को अपने जीवन में सच की कसौटी पर बने रहने के लिए..”भोजन के रूप में लेने वाले ‘अन्न’ के साथ-साथ रहन-सहन के शुद्ध वातावरण का भी बहुत बड़ा रोल है। मग़र ये सब प्रारब्ध के अधीन होता है।
अक्सर आपने देखा होगा..हर घर-परिवार के बीच कई एक बिंदुओं पर ‘बाप-बेटे’ की ‘राय’ भी अलग-अलग होती है..क्योंकि वह वैचारिक-धरातल पर उनका अपना-अपना ‘मत’ है। और ‘विचार’ का अपना एक दायरा भी होता है। दायरे से बाहर जाने पर उसी वैचारिक-अंतर-भेद को ‘मतभेद’ करार दे दिया गया है, हालांकि, मतभेद कोई असहज प्रतिक्रिया नहीं है। ये एक पूर्ण स्वाभाविक प्रक्रिया है।
अन्य सन्दर्भ में, यदि किसी वार्तालाप के दौरान वक्ताओं के बीच ‘मतभेद’ ज्यादा हों तो वहां समझदारी अपने को विड्रॉ कर लेने में है। यदि हम वक़्त रहते ऐसा कर पाएं, शायद हमेशा ‘मनभेद’ जैसी भयंकर बीमारी वहीं से लगती है।..
क्योंकि आवेश में आकर जब वक्त के रूप में हम अपनी हद लांघने लगते हैं तब ‘मतभेद’ जो है कब ‘मनभेद’ बन जाता है..ये पता ही नहीं चलता। ऐसी स्थिति से ही तो बचना है। धन्यवाद👍