अपने कर्मयोगी माता-पिता, पारिवारिक संस्कार,गुरुओं के आशीर्वाद व अच्छे साथियों की संगति से ..जीवन के आरम्भ से ही सरल स्वभाव मेरे आचरण का हिस्सा रहा है। इसलिए जहाँ तक सम्भव होता है। सभी की भावनाओं का सम्मान करने की मेरी कोशिश होती है। मग़र एक दायरे तक।
मेरी माँ के अनन्त में विलीन होने के महज़ दस महीने के अंतराल पर जब मेरी सुयोग्य पत्नी मेरी ज़िंदगी ‘नीरज चौधरी’ सत्रह फरवरी,2022 को इंटेस्टाइन के एक सामान्य से आपरेशन के बाद ठीक होते-होते उन्नीसवें दिन आगरा के एस एन मेडिकल कॉलेज, में छह मार्च,2022 को अचानक मुझ से हाथ छुड़ाकर वे भी अनन्त में विलीन हो गयीं, तो ये मंजर न सिर्फ असहनीय था, वल्कि बहुत ही अप्रत्यासित भी था।
बात लम्बी है मगर सारे मंजर को क्लियर करती है। उनकी अंतिम यात्रा,अंतिम संस्कार सब कुछ अपनी आँखों से देखा, सारे आवश्यक कर्म-कांड हमारे होनहार बेटे के हाथों विधिवत होते देखे, गांव में अपनी पैतृक हवेली पर त्रियोदशी तक लोगों के बीच भी बैठे। रोजाना आने वालों का तांता लगा रहा.. घर-परिवार व नाते-रिश्तेदारों को उनकी याद में ख़ूब रुदन मचाते देखा।
मग़र न जाने क्यों ‘दिल है कि मानता नहीं’ कि, ‘देवीजी’ अब इस दुनियाँ बिच नहीं हैं.. दिल यही समझता रहा.. कि गांव में नहीं, तो अपने माइके में..या हाथरस वाले घर पर होंगी..
त्रियोदशी के बाद पंद्रह वें दिन हरिद्वार में गंगा तट पर ‘अस्थि-विसर्जन’ के समय शायद उनकी अंतिम विदाई के ख़्याल से मन बहुत भारी हो गया..था। उस वक्त दिल ने कुछ महसूस किया होगा.. तो मेरे अन्तर्मन में एक अजीब से घबराहट हुई..थी।
जब वह बीमार हुई तो सोलह फ़रवरी की रात हॉस्पिटल के डॉक्टटर्स व उनके दोनों डॉक्टर्स भाइयों के परामर्श पर नीरज जी को हॉस्पिटल सिनर्जी प्लस, आगरा ले के गए थे..इलाज के उन्नीस दिन और ये पंद्रह दिन अर्थात..बीस मार्च, 2022 तक नियति के हाथों मजबूर हमने विधिवत तरीके से उनके सारे संस्कार पूरे किए..फिर गांव आकर .. अगले दिन इक्कीस मार्च की सुबह लगभग चार बजे अपने आपको ठगा सा महसूस करते हुए बड़े भारी मन से दोनों बहन,बहनोई,बेटी-दमाद,प्यारी सी नातिन व बेटे रॉबिन के साथ..गांव से अपने हाथरस वाले घर के लिए रवाना हुए..
(19+15) चौंतीसवें दिन नीरज जी के बिना जब कॉलोनी में हमारी एंट्री हुई, तो अपने जीवन की ‘अधूरी कहानी’ के ख़्याल से..दिल को ऐसा लगा कि कॉलोनी की गलियां, पार्क, घर के सामने चौपाल के आस पास खड़े कुत्ते जिन्हें देवी जी नियम से रोटियां खिलाती थीं. ये सभी मुझ से पूछ रहे हों कि, मास्टरनी कहां हैं.. ? इस भाव से विह्वल होकर मेरे मन में एक हूक सी उठी..
नियति के सामने खुद को इतना मजबूर मैंने इससे पहले कभी नहीं पाया था। जैसे ही घर में घुसे,तो उनकी चीजों को देख-देख कर तो सब्र की इन्तिहा हो गयी.. अब तो बस दिल बैठने लगा..बच्चों से अपने आंसू छुपाते हुए बाथरूम में चला गया। अपने आपको सम्भालते हुए, पौधों में पानी लगाने के बहाने घर से बाहर चला आया।
मग़र मेरा धर्मसंकट समझिए .. कि मैं उस वक़्त एक मर्द होने के नाते..न केवल नीरज जी का पति ही था।अपितु उनके बच्चों के लिए एक पिता, दामाद जी के लिए गुरु के साथ साथ एक ससुर, दोनों बहनों का छोटा भाई, आई मीन एक ही समय में वहां उपस्थित सदस्यों के लिए मैं,कई एक रोल्स में था। इसलिए मेरे धैर्य की परीक्षा थी।
गांव में बुजुर्ग तेरह दिन तक यही तो समझाते रहे कि “बेटा! अब तुम्हें समझदारी से बहुत भारी-भरकम होना होगा” उस वक़्त ऐसे ख्यालों से किसी तरह मैने जज़्बातों पर काबू पाया।
हमारे व घर के हालात देखते हुए तसल्ली के लिए सभी रिश्तेदार हफ्ते दस दिन के लिए घर पर हमारे साथ ही रुक कर समझाते रहे..हमारा मन बांटते रहे..
ये पढ़कर आपको लग रहा होगा.. कि मानसिक स्तर पर लिखते वक़्त भी मेरी हालत बहुत अच्छी नहीं है।
मग़र ऐसा नहीं है अब दिल ने स्थिति को काफी समझ लिया है वह जान गया है कि अब ताउम्र ऐसे ही रहना होगा।
फिर बेटे रॉबिन की फुटबॉल के लीग मैच चल रहे थे .. तो वह दिल्ली चला गया ,इधर मैं कॉलेज की बोर्ड परीक्षाओं के कारण विद्यालय जाने लगा इस तरह धीरे धीरे व्यस्त होते गये। ड्यूटी जाने-आने से मेरी मनःस्थिति बदलने में मेरे विद्यालय-परिवार के साथियों ने भी मेरी बहुत मदद की।
वैसे खाली जगह तो किसी की कभी भरी ही नहीं जा सकती.. लेकिन नीरज जी जैसे चरित्र तो बहुत कम होते हैं दुनियां में इसलिए उनकी तो कभी भी नहीं..ऐसे व्यक्तित्वों में बेसुमार विशेषताएं जो होती है। जब मेरे हाथ कुछ बचा नहीं,तो अब उनके गुणों को बताने का क्या प्रयोजन..? ?😢
दरअसल, बच्चों के साथ-साथ मैंने हमारे पूरे परिवार ने नीरज जी को सदैव भरपूर प्यार व सम्मान दिया जो उनका हक था।
मग़र मैं, ऐसा सोचता हूँ कि, नीरु अपनी अधिक उदारता के कारण..सिर्फ ‘हाउस-वाइफ’ के फ्रेम में ही स्थापित होकर रह गयीं। जबकि वे एक सफल बिज़निस-वुमन, समाज-सुधारक वाली सूझ-बूझ व प्रतिभा की भी धनी थी।
नीरज जी को खो कर..सिर्फ एक पत्नी को ही नहीं.. मैंने एक बहुत ही गुणवान,तेज तर्रार सलाहकार व अपने एक अज़ीज दोस्त को भी खो दिया है।
इसीलिए मेरा तो कोई ऐसा पल नहीं है जब मैं उनकी कमी महसूस न करता होऊं। मैं विल्कुल भी अकेला नहीं हूँ, हरपल उनकी यादों के नगर में ही रहता हूं। मैं हरपल उन्हें अपने संग पाता हूँ। उमीद करता हूँ उनकी यादों के सहारे एकदिन ‘वक़्त’ मुझे भी पास आउट करदे।
मुझे इस बात का पछतावा सदैव रहेगा। क्योंकि गांव में हवेली वाले अपने लिविंग-पोर्शन का री-कंस्ट्रक्शन,
बिज़निस पॉइंट ऑफ व्यू से गांव में बनीं रोड-साइड दुकानें व बिल्डिंग,
खेरिया पर ओंन रोड टू-वे साइड खरीदा गया बेहतरीन लोकेशन का चार बीघा खेत कम प्लॉट..
ये सब देवीजी की ही सूझ-बूझ का नतीजा है। अब कोई मोटिवेटर न होने से लग रहा है कि, प्रगति का सिलसिला थम ही जाएगा।
हाँ, वक़्त को यदि मंजूर हो, तो हम चाहेंगे ईश्वर हमें शक्ति व सामर्थ्य दें कि, आने वाले समय में उनके ‘विज़न’ को धरातल पर क्रियान्वित कर..हम उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दे पाएं।
क्या करें..प्रारब्धवश उनकी उम्र ही कम पड़ गयी..जिससे नियति के आगे किसी का कोई बस न चल सका..अन्यथा आज हमारे घर-परिवार में जो सुख-सुविधाएं हमें प्राप्त हैं सही मैनेजमेंट के तहत सेटल की हुई सभी व्यवस्थाएं जिन्हें वे तैयार करके हमारे हवाले कर गयीं..जिनका वरबस हम उपभोग अवश्य कर रहे हैं। लेकिन आज ये व्यवस्थाएँ कचोटती हैं क्योंकि इन सुविधाओं का सच्चा आनन्द नीरज जी के साथ ही था।
सच कहूँ ..कि, ‘प्लेजर-फीलिंग ऑफ लाइफ’ तो उन्हीं के साथ चली गयी। अब तो बस लाइबिल्टीज के लिए जी..ना ही बाकी है। और कुछ नहीं… कभी-कभी “हमारी अधूरी-कहानी” का ख़्याल..मेरे दिल में घुटन पैदा कर देता है।
नीरज जी ने अपना जीवन सदैव त्यागपूर्ण भाव में ही जिया।
बात क्या है वे ‘हद से बेहद’ की सोच रखतीं थी। शायद उनका आध्यत्मिक स्तर ऊँचा था। जो एक सामान्य गृहणी के लिए बहुत बड़ी बात है। वे सहनशील, परिवार के लिये पूरी तरह समर्पित,उदार, मितव्ययी एवं बहुत ही ‘सरल’ हिर्दय.. थीं। शायद इसीलिए किसी भी मामले में ख़ुद के लिए वे कभी गंभीर नहीं रहीं। दुर्भाग्य से अपने स्वास्थ्य के..प्रति भी नहीं, वरना! आज परिणाम कुछ और हो सकते थे।
मग़र अफ़सोस!!!के अतिरिक्त अब कुछ भी नहीं बचा।
हां, कभी-कभी अपनी अधिक उदारता के लिए स्वयं को वे ज़िम्मेदार ठहराती भी थीं। उनकी वही बातें आज मेरे दिल को कचोटती हैं। मैं, पल-पल अपने आपको धिक्कारता हूँ..आख़िर उनकी परेशानी मैं, क्यों नहीं जान सका..?
परिवारीजन, रिश्तेदार, गुरुजन, शिष्यगण, मित्रमंडल व शुभचिंतक..जीवन में आये हुए मेरे इस ‘अकेलेपन’ को लेकर काफी चिन्तित रहते हैं,परेशान हैं। मानवता के नाते मेरे बारे में सोचकर उनका दुःखी होना स्वाभाविक ही हैं।
मैं उन सभी की भावनाओं का सम्मान करते हुए हिर्दयतल से हमेशा शुक्रऱ गुजार रहुँगा।
इसमें तो कोई दोराय है ही नहीं कि, यादों में आज भी मेरी ज़िंदगी मेरी हमदम ‘नीरज जी’ हर पल मेरे साथ हैं। और सदैव रहेंगी.. इसलिए किसी भी संयमी-चरित्र के लिए स्थूल रूप में ‘अकेलेपन’ के बहुत अधिक मायने होते भी नहीं हैं।
ऐसे वक़्त में वियोग-श्रृंगार का भी अपना एक अजीब रोल है।
सारे सवाल इसलिए भी सिरे से ख़ारिज हो जाते हैं क्योंकि अपनी व्यक्तिगत सैद्धांतिक विचारधारा के आधार पर आत्मिक दृष्टि से हम दोनों जन्म जन्मांतर एकरूप हैं।
दूसरे, यदि ‘अकेलापन’ है भी, और सकारात्मक दृष्टिकोण से सोचें, तो इतिहास साक्षी है..आध्यात्मिक व साहित्यिक विचारधारा में विद्वानों के द्वारा किसी भी विचारक के लिए “अकेलेपन” को वरदान तक बताया गया है!!!
स्वाभाविक है, भौतिकता का प्रभाव लोगों पर जैसा होता है वैसी ही स्थिति व्यक्ति की होती है। मग़र ये ‘पर्सन टू पर्सन’ डिफरेंशियेट है। हाँ,उससे सामंजस्य बिठाने में थोड़ा वक़्त तो लगता है। फिर लगभग सब सामान्य सा होने लगता है।
चलो अब उनके साथ बितायी वो बेहतर “जिंदगी” न सही,एक आम ‘जीवन’ उनके संस्कारित बच्चों के बीच एवं उनकी तमाम यादों के सहारे गुज़र ही रहा है,बस ऐसे ही गुजरता रहे..आज स्थूल रूप में मुझसे जुदा हुए उन्हें लगभग तीन महीने हो गए.. त्रियोदशी तक समाज के अनुभवी व संयमी लोगों के विचारों को न केवल सुनकर वल्कि अक्षरशः पालन कर .. अपने बच्चों, परिवार व समाज में अपनी एक शिक्षक एवं विचारक की भूमिका का ख़्याल रखते हुए.. मैंने न केवल अपने व्यक्तिगत जज़्बातों पर नियंत्रण करने का प्रयास किया है अपितु खुद के खान-पान, रहन-सहन अर्थात लिविंग स्टाइल आदि में तब्दीली कर एक सिम्पल-जीवन जीने की ओर कदम बढ़ाए हैं.. इसके लिए मैं अपनी विल-पॉवर का शुक्रऱ-गुजार हूँ।
हाँ,चार मई,2021 को माँ के जाने के बाद से न जाने क्यों मुझे ऐसा लगने लगा है कि, मैं, बॉडी कॉन्शियस कम सोल-कॉन्शियस कहीं अधिक होता जा रहा हूँ,या शायद इन घटनाओं ने बना दिया है। क्योंकि मेरा लोगों व चीजों से अटैचमेंट कम होता जा रहा है। जबकि पहले ऐसा नहीं था।
कहीं ऐसा तो नहीं कि, मैं भी नीरज जी की तरह त्यागपूर्ण भाव में जीने लगा हूँ..?
क्योंकि भौतिक दूरियाँ अब पहले की तरह नहीं सताती।
इसलिए प्रारब्धवश बने मौजूदा हालातों से मैं सामंजस्य बिठाने में अपने आपको काफ़ी सहज महसूस कर रहा हूँ। आज न केवल अपने हाल पर..व्यस्त दिनचर्या में हूँ। वल्कि अपनी “ज़िंदगी” मतलव “नीरज जी” के साथ मानवता की जिन मर्यादाओं व संयम के साथ जी..रहा था। आज भी उसी संयम व धैर्य के साथ रहने के लिए दृढ़ संकल्पित हूँ। ईश्वर मुझे सामर्थ्य दें जिससे आप सभी को आश्वस्त कर सकूं, कि, आगे भी ऐसे ही रहते हुए हमेशा अपने फ़र्ज़ पर बना रहुंगा। ताकि मुझको लेकर मेरे अजीज परेशान न हों।
धन्यवाद👍
; योगेन्द्र पचहरा, नीमगाँव