177- भगवद्गीता

सभी जानते हैं कि, भगवद्गीता में..अर्जुन प्रश्न करते हैं और श्री कृष्ण उनके प्रश्नों के उत्तर देते हैं।

उन्होंने अर्जुन के प्रत्येक प्रश्न का उत्तर बड़े धैर्यपूर्वक दिया है.. क्योंकि श्रीकृष्ण चाहते हैं कि, युद्ध से पहले अर्जुन के सारे संशय मिट जाने चाहिए ताकि युद्ध वह पूरे मन से लड़ सके

‘विश्वास-पद्धति’ का ये सिद्धांत है कि, व्यक्ति को सदैव कोई भी कार्य शुरू करने से पूर्व उससे सम्बंधित अपने मन में उठे सारे संदेहात्मक-प्रश्नों का हल अवश्य जान लेना चाहिए।

बनारस की ‘सोनम पटेल’ अभी महज़ आठ वर्ष की एक बच्ची है। मग़र ‘बिलीव-सिस्टम’ के आधार पर उन्हें भगवद्गीता के पूरे सात सौ श्लोक कंठस्थ हैं। वो ये भी बता देती है कि, कौन से श्लोक का वर्णन किस अध्याय में हुआ है।

‘विश्वास-पध्दति’ के ही समर्थन में ब्रिटिश के एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक मिस्टर जौलीनिक ने गीता का गहन अध्ययन करने के उपरांत कहा है.. कि,

चाहे जो परिस्थिति हों.. आप देख लीजियेगा अब तक “भगवद्गीता” का एक-एक श्लोक सही साबित हुआ है और आगे भी सदैव सही ही साबित होगा।

इसीलिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रियता की दृष्टि से भगवद्गीता सार्वभौमिक ग्रंथ है।

मेरे विचार से ‘गीता’ को किसी धर्म विशेष की धार्मिक पुस्तक की तरह न देखकर हमें भगवद्गीता को सनातन सत्य पर आधारित वेदव्यास जी द्वारा लिखे गये अंतिम ‘ग्रन्थ’ के रूप में मान्यता देना कहीं अधिक बेहतर रहेगा। निःसन्देह इसकी प्रासंगिकता तो जब तक ये दुनियाँ है तब तक रहेगी ही।

उसका मूल कारण है कि, “भगवद्गीता” एक वैज्ञानिक ग्रंथ (साइंटिफिक-एपिक) है।

भगवद्गीता से विमुख देश के ‘नीति-नियंताओं’ की ओच्छी-मानसिकता के कारण देश में तुष्टीकरण, जातिवाद, धर्मवाद भाई-भतीजावाद,ग़रीबी जैसी विकृतियों का उन्मूलन न करने की नीयत ही,जनता का असली दर्द है। बेहतर होगा..समय रहते ही देश के नेता भी अपने सही फ्रेम में आ जाएं।आ

अन्यथा की स्थिति ‘उनके’ लिए..न केवल चिंतनीय है वल्कि बहुत निन्दनीय भी होगी।

मग़र ये भी सच है कि,”चरित्रवान-व्यक्तित्व” भगवद्गीता का आश्रय अवश्य ले लेते हैं। क्योंकि वे स्वहित में कम ‘जनहित’ में कहीं अधिक सोचते हैं..

अब चौकाने वाली बात ये है कि, चाइना के ‘न्यूअंग्सकी’ ने ‘भगवद्गीता’ का गहन अध्ययन करने के बाद भगवद्गीता को न केवल अपने देश में पी.एस.एम. यानी ‘प्रॉब्लम-सॉल्विंग मन्नुअल’ घोषित कर दिया, वल्कि उन्होंने चाइना में “भगवद्गीता” को अपने शैक्षिक-पाठ्यक्रम में एक अनिवार्य विषय के रूप में भी जगह दी है।

आपको विदित होगा कि, भगवद्गीता अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई भाषाओं में उपलब्ध है।

इसीलिए भगवद्गीता को दुनियाँ का ‘शिक्षा-जगत’ बहुत पहले स्वीकार चुका है।

सम्पूर्ण विश्व में चलने वाले मैनेजमेंट के पाठ्यक्रम की अवधारणाओं से संबंधित सोल्यूशन्स.. श्रीकृष्ण की ‘भगवद्गीता’ में बहुत स्पष्ट तरीके से बताये गए हैं। भगवद्गीता का अनुसरण करने वाले व्यक्ति व देश इसका लाभ ले रहे हैं।

मेरे ख़्याल से जब तक ये दुनियाँ है,तब तक भगवद्गीता की प्रासंगिकता बढ़ेगी.. कभी कम नहीं होगी।

अपने आकार, वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित गूढ़ अर्थ एवं वजन के आधार पर भी “भगवद्गीता” को दुनियाँ का सबसे बड़ा ग्रन्थ कह दिया जाय,तो शायद कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

वह इसलिए क्योंकि भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री मिस्टर मोदी ने अभी कुछ ही दिन पूर्व भगवद्गीता का अनावरण किया है जिसका वजन लगभग ‘आठ सौ किलोग्राम’ है। जी हाँ! आपने सही पढ़ा है आठ सौ किलोग्राम यानी उसका भार आठ कुन्तल ही है।

मांफ कीजियेगा भगवद्गीता के संदर्भ में.. मैं अपने पच्चीस नवम्बर, दो हजार उन्नीस (25 नवम्बर,2019) को प्रकाशित हुए सातवें आर्टिकल “गीता विज्ञान से आगे है..” की बात को बल देते हुए एक फिर से यही कहुंगा कि,

“आज भारत देश में भगवद्गीता को ‘कोर्ट’ से हटाकर ‘कोर्स’ में अनिवार्य रूप से पढ़ाये जाने की आवश्यकता है।”

जो, “मैं-मेरा,अपना-पराया,तू छोटा, मैं बड़ा..आदि” विकृतियों में हम लोग इस कीमती जीवन को खपा दे रहे हैं..यदि अभी भी भारत के पाठ्यक्रम में भगवद्गीता शामिल होती है, तो कम से कम आने वाली जैनरेशन के दिमांग में वैसी विकृतियां घर नहीं करेंगी। जो हम लोगों के मन-मष्तिष्क पर एक कार्मिक लेयर जैसी जम गईं है।

गीता के तीसरे अध्याय के चौथे श्लोक में श्रीकृष्ण, अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं कि, “इतिहास में झांक कर देख लो!.. जो व्यक्ति अपने मन व इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं कर पाते, देर-सवेर उनका विनाश ही होता है।”

स्वामी विवेकानंद ने भी भारतीय शिक्षा प्रणाली के संदर्भ में अपने एक वक्तव्य में ये कहा है कि, “व्यक्ति के लिए अपने मन व इंद्रियों पर नियंत्रण पाना ‘शिक्षा’ का पहला ‘सबक’ है।”

‘महाभारत’ का एक प्रकरण बहुत ही रोचक है..ये मंजर उस दौर का है जब पांडवों और श्रीकृष्ण दोनों के लाख प्रयासों के बावजूद युद्ध नहीं टल सका..

और दुर्योधन ने बड़ी होशियारी से श्रीकृष्ण की सारी सेना मांग ली। तब कृष्ण अर्जुन को व्यंग्य करते हुए कहते हैं..

“अर्जुन ! हार निश्चित है तेरी।

पर मत हो उदास!

अरे ! सारा मख्खन, तो दुर्योधन ले गया

तेरे लिए बची है सिर्फ छाछ।”

श्रीकृष्ण ने ये व्यंग्य अर्जुन की मनःस्थिति को परखने के लिहाज़ से किया था।

व्यंग्य के जवाब में अर्जुन ने भी चुटकी लेते हुए माधव को बोल दिया कि,

“जीत निश्चित है मेरी।

क्यों होऊं..उदास।

मख्खन रखकर होगा क्या..?

‘माँखन-चोर’ जो है मेरे साथ।।”

उस वक़्त श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सम्पूर्ण गीता सुनाने के बाद अन्त में यही कहा कि,

“मामेकं शरणम व्रज..”

हे अर्जुन ! यदि तुझ से कुछ न हो तो तू मेरी शरण में आजा। और अपने सारे कर्म मुझे अर्पित करता चल.. तो तू निश्चय ही संशय रहित ज्ञान से परिपूर्ण हो जाएगा..?

श्री कृष्ण का विराट रूप देखने के बाद..अर्जुन ने यही किया।

“बिन जले भभूति नहीं।

बिन चले अनुभूति नहीं। अर्थात

कोई चलता पदचिन्हों पर है।

तो कोई.. पदचिन्ह बनाता है।

रचता है, जो इतिहास जग में

दुनियाँ में पूजा भी वही जाता है।”

धन्यवाद👍

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