176- बुरी-नज़र

मेरी सुयोग्य पत्नी श्रीमती नीरज चौधरी हॉस्पिटल में इलाज के दौरान ठीक होते-होते अचानक ‘कार्डियक-अरेस्ट’ या अटैक जो भी होता है उसके कारण अपना भौतिक-शरीर छोड़ अनंत में विलीन हो गयीं। जिससे हमें ऐसा लगता है कि, पिछले अट्ठारह दिन से बीमारी के ख़िलाफ़ पूरी मुस्तेदी के साथ हम एक युद्ध सा लड़ रहे थे। डॉक्टर या हमारी मेडिकल टीम से न जाने कहाँ चूक हुई कि,अचानक उन्नीसवें दिन हम लगभग एक जीती हुई बाजी हार गये..😢

इस घटना से आहत.. अप्रैल,2022 के तीसरे सप्ताह में मेरे एक शुभचिंतक बहुत जज़्बाती होकर .. एक दिन मेरे पास आये उन्होंने बड़े आग्रह के साथ पहले मुझ से वचन लिया..मुझे लिखने को बाध्य कर लिया..तब कहा, “भईया जी! मेरे इन विचारों को मेरे ही सामने कोई भी पॉइंट कट न करते हुए..जो आप ब्लॉग लिखते हो उसी रूप में मेरी ओर से ऑनलाइन पब्लिश कर दो, तो आपकी मुझ पर बड़ी मेहरबानी होगी। क्योंकि मैं अपना विचार आपके ब्लॉग के थ्रू ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाना चाहता हूँ.. जबकि,

एक कॉमन सी बात है अपने बारे में स्वयं लिखना या बोलना..पार्ट ऑफ बूस्टिंग में ही आता है जिसके लिए मैं एग्री नहीं हो सकता था..मगर .. महाशय जी ने पहले वचन जो भरवा लिया था। खैर..मेरा जीवन जैसा भी है शुरू से आप सबके सामने खुली किताब की तरह है..और सदैव ऐसे ही रहेगा।

शुभचिंतक महोदय अपना नाम छुपाते हुए लिखवाते हैं, कि कोई माने या न माने हमारे भैया-भाभी की जोड़ी लाखों में एक थी।उनका ये मानना है,अवश्य ये जोड़ी किसी ‘बुरी नज़र’ की शिकार हुई है..”

ज़ाहिर है..’पचहरा-परिवार’ के प्रति उनका ये आत्मीय भाव उनके प्रेम और सम्मान को दर्शाता है। इसके लिए मैं अपने परिवार के हर सदस्य की ओर से उनका आभार प्रकट करते हुए बार-बार सादुवाद देता हूँ।

आगे वे लिखते हैं .. कि, एकबार को लोग ये भी कह सकते हैं कि, हम पर भैया का रंग चढ़ हुआ है..परन्तु वे जो भी कहें..मेरे ख़्याल से भईया-भावी जैसी छबि के लोगों का प्रारब्ध इतना खराब नहीं हो सकता!! जैसा अजीब-खेल उनके साथ हुआ है।

क्योंकि, पिछले लगभग बीस वर्ष से मैं ही नहीं ‘हम सब’ और आप भी इन दोनों के आचरण को देखते चले आ रहे हैं.. केवल वे ही नहीं उनके परिवार का हर सदस्य गुणवान, सहनशील एवं समझदार हैं। और ज्यादा क्या कहूँ..खानदानी-संस्कार वाले लोग सब ऐसे ही होते हैं।

मग़र मांफ कीजियेगा.. नीमगाँव के मुखिया परिवार की हवेली में मेरे अकेले ‘भईया-भाभी’ की ही नहीं वल्कि मेरे भतीजे-भतीजी की भी छबि एकदम अलग है। जैसे ;

उनकी बेटी निधि शादी से पूर्व ही लॉर्ड कृष्णा पब्लिक स्कूल, व दिल्ली पब्लिक स्कूल, अलीगढ़..एवं ट्रांसफर के बाद डी पी एस मुरसान । जैसे स्कूलों में महज़ अपनी योग्यता व वाकपटुता के आधार पर एज ए टीचर सेलेक्ट हो..पढ़ा चुकी है और देखिए…ईश्वर ने इतनी कम उम्र में भईया+भाभी को सही वक़्त पर बेटी की शादी से (फरबरी,2015) भी निवृत कर दिया। और अधिक खुशी की बात तो ये हुई कि, उनकी बेटी और दामाद जी ने वसुंधरापुरम के स्पेशल कैंपस में लगभग तीन वर्ष पूर्व अपना ख़ुद का एक सुंदर आशियाना भी बना लिया है।

कौन नहीं जानता..? उनका बेटा रॉबिन मेरा मतलव ‘सिद्धांत पचहरा’ राष्ट्रीय स्तर पर हिमाचल व गोआ से दो-दो “स्वर्ण-पदक” लेकर दिल्ली असोसिएशन के बेहतरीन क्लब रॉयल-रेंजर्स फुटबॉल क्लब, दिल्ली का एक अच्छा फुटबॉलर होने के साथ-साथ..भविष्य में अच्छे से फाइनेंशियली सेटल होने की सही दिशा में आगे बढ़ रहा है…

सब कुछ एकदम अच्छा चल रहा था.. भईया-भाभी भी हर वर्ष आपसी सूझ-बूझ के साथ स्टेप-वाइज अपने उत्तरदायित्व-सम्बन्धी कार्यो को समय से करते चले जा रहे थे।

अचानक एकदम से न कोई बहुत बड़ी बीमारी..जो दिक्कत थी उसके ट्रीटमेंट में भी लाभ होते-होते दूसरे सारी रिपोर्ट्स अच्छी आने के बावजूद हॉस्पिटल से उन्नीसवें दिन डिसचार्ज होने के दो दिन पूर्व ..अटैक का क्या औचित्य था..? जबकि ECG आदि सब कुछ ठीक आया था। शुभचिंतक महोदय लिखते हैं..”मुझ से पूछो तो ये सिर्फ “दूसरों के सुख से दुःखी रहने वाले गंदे विचार वाली मानसिकता” की “बुरी-नज़र” का ही दुष्परिणाम है,और कुछ नहीं।”

भले ही आज के दौर में लोग इन नज़र-बजर की

बातों में विश्वास नहीं करते,..फिर भी मेरे ख़्याल से चाहे किसी भी स्तर पर सही.. इस घटना की समीक्षा तो होगी ही..

भईया कहें न कहें .. मैं, तो यही कहुंगा कि किसी “बुरी-नज़र” का शिकार हो गया हमारे “पचहरा-परिवार” का “हंसता-खेलता घर” देवी जैसी भाभी जी आज हम सबके बीच नहीं रही..!! मेरी तो इस घटना का ख़्याल आते ही छाती फटती है… तो सोचिए!! भईया और उन दो मासूम बच्चों पर..रोजाना उन्हें घर न देखकर क्या बीतती होगी!!!

ये सत्य है। स्त्री ही हर परिवार में ‘घर’ को अच्छे से मैनेज कर पाती हैं। इसलिए दुर्भाग्यवश कभी स्त्री को कुछ हो जाने पर घर तो क्या ऐसा लगता है.. पूरी दुनियाँ’ ही लुट गयी हो।

हम मानते हैं, पुरूष यदि बहुत ततपरता से घर सम्भालना चाहे.. तो जरूर सम्भाल सकता है। सक्षम है लेकिन एक स्त्री की तुलना में पुरूष को बहुत अधिक जुगत एवं सहनशीलता की आवश्यकता होगी।

वो तो अच्छा है संयोगवश उनके दोनों बच्चों के घर पहले से एक ही कॉलोनी में हैं। उनकी बेटी ने ये भी अच्छा किया कि, जो कामवाली उनके अपने घर में काम कर रही थी। जो शायद जाति से नाई है, उसी को 1500 रु महीने में अपने भाई रॉबिन के घर पर भी लगा दिया। धन्यवाद बेटा ठीक किया 👍

क्योंकि हमें पता है। उनका बेटा और दामाद जी दोनों लोग पहले से ही अपने-अपने जॉब के कारण आउट ऑफ स्टेशन रहते हैं।

इसीलिए कॉमन सी बात है। बाप-बेटी का खाना एक जगह ही बनता होगा, मेरा मतलव रॉबिन वाले घर। ठीक है।

सुना है,अपनी नानी को बहुत मिस करने के बावजूद भी निधि की तीन वर्ष की प्यारी सी बच्ची “रिया” रात में नींद आने तक अपनी ‘अधूरी-कहानी’ के चरित्र बन रह गये नानू के साथ खेल-खेलकर .. उनका मन बहलाने का पूरा प्रयास करती है।

यदाकदा पचहरा भईया से हमारी भी बात हो जाती है।

वैसे वे अपने कॉलेज, बिज़नेस एवं लेखन-कार्य आदि में पहले से ही काफ़ी व्यस्त रहते हैं। व्यस्त रहना सदैव अच्छी बात है।

अग़र कुछ समय के लिए लोगों की सिमपैथी को एक तरफ रखकर देखा जाय, तो उस मनहूस तारीख़ 6 मार्च,2022 से आजतक के अनुभव का हवाला देते हुए वे बडे अफ़सोस के साथ कहते हैं कि, “भई! पारिवारिक एवं सामाजिक परिवेश में बिना “गृह-लक्ष्मी” के पुरुष की “ज़िंदगी” के मायने कुछ भी नहीं होते।”

उनकी वर्तमान परिस्थिति को देखते हुए ऐसा लगता है कि, ‘वक़्त और हालात ने उनकी खुशहाल-जिन्दगी को एकदम “वीरान” ही कर दिया है।

जो घर उन्होंने किसी समय बड़े चाव से बनाया होगा। जिस प्रकार कॉलेज या ऑफिस से छुट्टी होने पर सभी को अपने घर पहुँचने की जल्दी होती है। स्वाभाविक है उन्हें भी होती होगी। मग़र मुझे ऐसा लगता है। आजकल उसी घर पर जाने के वक़्त एकबार को पुनः ‘अकेलेपन’ के वातावरण में जाने से उन्हें थोड़ी घुटन तो होती होगी।

“बुरी नजर” ने आज कुछ ऐसे हालात पैदा कर दिये हैं कि, वही वसुन्धरापुरम वाला मंदिर सा घर..”88A पचहरा-हाउस” उन्हें काटने को आता होगा।

बहरहाल, मेरे युग भईया स्टूडेंट-लाइफ से ही आध्यात्मिक विचारधारा के हैं। और काफी ब्रेव हैं। मुझे पूरा भरोसा है, वे अपने आप को संभाल पाएंगे..

लेकिन, आप सोचिएगा, मैंने तो देखा है।

गैरिज सहित उनके घर में पांच बड़े-बड़े कमरे हैं। उनमें ‘एक अकेले’ व्यक्ति का रहना.. कितना खालीपन है!

ये सिर्फ महसूस किए जाने वाले हालात हैं जिन्हें कभी शब्दों में बयां नहीं कर सकता।

हे ईश्वर! आज जिस जगह वे, खड़े हैं ऐसी जगह पर कभी किसी को खड़ा मत करिएगा।

ये तो शुकर है कि, वे लिखने-पढ़ने के शौकीन हैं। ये भी सच है कि, वे अपने आपको सदैव अच्छे कार्यों में व्यस्त रखते हैं। भटकाव से हमेशा दूर रहे हैं। उनके डेली-सड्यूल व कार्य-शैली तो पहले से ठीक रही है।

मग़र इसमें कोई शक नहीं है कि, भाभी जी के न रहने से हमारा ‘वट-वृक्ष’ भी हिल गया है।

हे! ईश्वर बहुत जल्द उन्हें इस हालात से उबरने की शक्ति व सामर्थ्य प्रदान कीजियेगा।

जाहिर है अब उनसे ज़िंदगी उस तरह तो नहीं जी..जाएगी.. जैसा उनका स्वभाव है।आजकल पूछने पर वे इतना ही बोलते हैं, .. “हाँ, बस ठीक हैं..सही हैं..” आप कैसे हैं..?

उनके ये शब्द हमारे सीने में तीर की तरह चुभते हैं। मग़र करें भी तो क्या..? इस जगह पर आकर सभी असहाय हो जाते हैं।

एक शुभचिंतक की कलम से..🙏🏻

2 thoughts on “176- बुरी-नज़र”

  1. मै रात्रि 1 बजे आपका भेजा हुआ हुआ आर्टीकल पढ रहा हूँ किया बीती है आप पर उसको सोचने मात्र से मेरे आशुओ की धारा रुक नहीं रही हैं और आप इस दुँख के भवसागर मे अभी है और शायद ही इस घटना को कभी भुला पायेंगे।
    मैंने अपनी मां को तीन साल पहले खोया था जो कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से पीडित थी उनके जाने का दुँख और अभी भी जहन मे है और शायद हमेशा रहेंगी
    और आप पर ये पहाड़ टूट गया है
    भगवान उनकी आत्मा को शांति दे
    और आप भी अपने आप को तकलीफ ना दे जिससे कि उनको भी तकलीफ ना हो कियो कि वो भी आपको देखकर दुँखी होगी।
    एक शिष्य होने के नाते मै आपसे हाथ जोडकर प्रार्थना करता हूँ

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