175- ‘राग-द्वेष’

महर्षि कपिल ने अपने सांख्य योग अर्थात दर्शन में बताया है कि,

“संसार में कहीं भी, कोई व्यक्ति पूरी तरह सुखी नहीं होता।” कभी फिजिकली,तो कभी मेंटली,व्यक्तिगत नहीं,तो पारिवारिक/ सामाजिक या देश – दुनियां के स्तर पर.. मगर “अपसेट” सिनेरियो तो किसी न किसी अवस्था में थोड़ा बहुत रहता है।

अगर आप ‘राग और द्वेष” को समझते हो, तो उसी सांख्य दर्शन में उन्होंने एक बात और..कही है कि,

“संसार ही वो जगह है जहां दिन-रात ‘राग और द्वेष’ चलता रहता है।”

अब आप खुद ब ख़ुद समझ गए होंगे , कि ये संसार कैसा है..?

जो लोग ऐसा मानते हैं, कि “संसार में बहुत आकर्षण है,बहुत सुख है। पता नहीं क्यों.. मुझे उन पर दया आती है। क्योंकि वे बड़ी भूल में हैं। मेरे ख्याल से वे अभी “सुख” और “आनंद” के अंतर से भी लगभग अपरिचित हैं।

चलो! मान लेते हैं..संसार में आकर्षण है,सुख है। मग़र क्या लोगों की मन:स्थिति में चैन / आनंद है..??

सांसारिक “सुख” की पहुंच केवल ‘शारीरिक-स्तर’ तक ही है। इसलिए केवल भौतिक चक्षु वाली लॉबी को उनके जीवन में कभी कोई कमी नहीं..दिखती। क्योंकि वे विज्ञान प्रदत्त असीमित भौतिक साधनों वाली सुविधाओं के सुख में जीवन तलाशते रहे हैं।

ये कहना अनुचित नहीं होगा कि, लोगों ने फेयर & फाउल किसी भी तरह से..असीमित ‘सुख-साधन’ जुटा लिए हैं मगर अंत:करण का ‘सुकून’ साधनों में होता ही नहीं।

क्योंकि सुकून या चैन मिलता हैं मन की शांति से,सब्र से.. यदि कम्पेरेटिव-स्टडी के आधार पर कुछ कहा जाय, तो भटकाव या अति भटकाव से व्यक्ति का मानसिक-स्तर हिला हुआ है।

इसीलिए ये सच है,कि आज लोगों के पास ‘मेंटली-प्लेज़र’ आई मीन “चैन” नहीं है। जिससे वे थोड़े में भी “चैन की वंशी” बजाते हुए आनंदित होकर सुकून में जी..सकें ।

आपसी झगड़े, फ्रॉड-मैटर्स, हत्याएं, दुर्घटनाएं,व्यभिचार, खान-पान शुद्ध न होने से,अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिद्वंदी देशों में वायरस फैलाकर जनहानि – धनहानि कराने के षड्यंत्रों से आए दिन नई-नई बीमारियों का उजागर होना।

इस प्रकार अनेकों ऐसी खबरें सुन-सुनकर व्यक्ति पूरा दिन राग-द्वेष, चिंता, तनाव, आदि से व्यथित “बेचैन” बना रहता है।

अच्छे समाचार तो कभी कभार ही मिलते हैं, जो उसे ख़ुशी देते हैं।

अब लोग सवाल करते हैं कि, “जब जीवन में दु:ख बहुत अधिक हैं, तो फिर कैसे जिएं..?

उत्तर – में यही कहना उचित है.. कि हम लोग अपने सोचने का ढंग बदलें। जिस प्रकार सुख स्थाई नहीं है, ठीक वैसे ही दुख भी हमेशा नहीं रहेगा। विश्वास न हो, तो इतिहास में झांक लीजिएगा। कि, जिस प्रकार सुख स्थाई नहीं है, वैसे ही दुःख के भी पांव ज्यादा देर नहीं टिकते, बस आवश्यकता होती है,नियम-संयम एवं ‘धैर्य’ के साथ अपने आचरण को पवित्र बनाए रखने की।

अगर हम थोड़ा बहुत अध्यात्म समझते हैं, तो ये भी सब व्यक्ति के अपने ही ‘संचित-कर्मों’ का खेला होता है। जो समय-चक्र के अनुसार गतिमान रहता है। समस्याएं आती हैं, और कुछ समय बाद स्वतः हट भी जाती हैं। जरूरत होती है, सम्भल कर कदम रखने की।

शिक्षा ;

ये “दु:ख / समस्याएं” आत्मिक स्तर पर व्यक्ति की चेतना को जगाते हुए.. उसका ध्यान “इष्ट” की ओर मुखातिब हो..इस ध्येय से आते हैं! क्योंकि माया का स्वभाव है इंसान को पल पल भ्रमित करना।

दरअसल, ये दुःख भी तो मानव की ही संपत्ति है। फिर भी न जाने लोग दुःख से इतने.. क्यों घबराते है..??

“संसार में सदैव रहने की तो छोड़ ही दीजिए, लम्बा जीवन जीने की खुशफ़हमी..भी बुद्धिमत्ता की बात नहीं होती।

चाहे कोई कितना भी शक्तिशाली क्यों न रहा हो!! क्योंकि इस संसार नियति है। यहां मानव मन को शारीरिक-सुख की अपेक्षा मानसिक-दु:खो की अनुभूति कहीं अधिक होती है। संतों ने इस समस्त संसार को दु:खालय कहा है। इसीलिए परम आनंद की प्राप्ति, तो यहां सर्वथा असंभव ही है।”

अब प्रश्न बनता है, कि – “दु:खों से पूर्णतया निवृत्ति, और पूर्ण सुख कैसे प्राप्त हो सकता है..?” विद्वानों के दिखाए रास्तों के आधार पर, तो इस प्रश्न का उत्तर

केवल वेदों और ऋषियों के बनाए शास्त्रों में ही है वो भी आत्मिक स्तर पर..पूर्ण सुख या परम आनंद की प्राप्ति, तो सिर्फ और सिर्फ “केवल्य / मोक्ष” से ही संभव है, अन्यत्र कहीं भी नहीं।”

“इसलिए “भगवत प्राप्ति” एवं मोक्ष की ओर अग्रसर होने के लिए वेदों,संतो और ऋषियों द्वारा बताए गए आदर्शों का अनुपालन देर सबेर करना ही होगा।

अच्छा! जब “मोक्ष” शब्द से पूछते हैं, तो वह मुस्कराते हुए अपने जवाब में कहता है.. कि दरअसल, सरल अर्थ में “मोक्ष” .. व्यक्ति के “मोह का क्षय हो जाना” ही है। अर्थात मनुष्य जी, ते जी.. दुनिया के सारे प्रपंचों का मोह त्याग दे ” बस उसका मोक्ष हो गया।

यदि इस सारे वृत्तांत पर मनुष्य की “तर्क बुद्धि” सच की मुहर लगाने को आतुर है, तो फिर “राग-द्वेष” क्यों..??

‘सच्चाई’ को न केवल जानने में वल्कि उसे सहज स्वीकारने में समझदारी होती है। तब जाकर “ज्ञान बुद्धिमानी” में कन्वर्ट हो पाता है।

आपके वेशकीमती समय को मेरा दिल से नमन..है।धन्यवाद 👍

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