मैं ‘स्वार्थी’ शब्द के पैरा मीटर से बात करूं, तो संसार में तीन प्रकार के लोग ‘स्वार्थी’ इमेज के होते हैं।
तीन प्रकार के स्वार्थी लोगों में से भी, दो अच्छे होते हैं, तीसरे प्रकार के लोग ‘स्वार्थ की मर्यादा’ से परे होते हैं।.. और इनसे भी परे कोई हैं..तो फिर वे ‘इंसान’ नहीं वे ‘राक्षस’ प्रवृत्ति के बहुत निकृष्ठ श्रेणी के होते हैं।”
स्वार्थी का अर्थ है, स्व+अर्थ अर्थात अपने लाभ के लिए काम करने वाला व्यक्ति।
व्यक्ति के जीवन में बहुत सा अभाव होता हैं। धन, बल, विद्या, भोजन, वस्त्र, मकान, सम्मान, सुख आदि का।
ये सब स्वभाविक हैं.. इसलिए मनुष्य स्वभाव से स्वार्थी है। परन्तु एक हद तक। वह सदा अपनी इन कमियों को पूरा करने के लिए कार्य करता रहता है।
एक निश्चित हद तक स्वार्थी होना बुरा नहीं है, बस इतना ध्यान रखना चाहिए, कि अपना स्वार्थ पूरा करते-करते आप से दूसरों का नुकसान न हो जाए। किसी की आत्मा आहत न हो जाय। यदि अपना स्वार्थ पूरा करते-करते किसी दूसरे व्यक्ति का नुकसान करने लगे, तो यह ग़लत है,अन्याय है।
मेरा आंकलन कहता है, संसार में स्वार्थी लोग तीन प्रकार के होते हैं।
“उत्तम, मध्यम, और निकृष्ट”
‘उत्तम स्वार्थी’ वे लोग हैं, जो दूसरों को सुख देते हैं। दूसरों को सुख देने के लिए, स्वयं को थोड़ा कष्ट हो जाय, तो उसकी भी वे परवाह नहीं करते।”
वे सोचते हैं, कि “हमें परोपकार करना है। दूसरों को सुख देना है। इसके फलस्वरूप हमारा प्रारब्ध सही हो जाय, शायद भगवान हमें सुख-शांति दे ।”
ऐसे लोग, संसार के लोगों से अपने परोपकार रूपी कर्म के फल की भी बहुत आशा नहीं रखते, बल्कि वे सिर्फ ईश्वर के प्रति आशावादी होते हैं।
“ईश्वर न्यायकारी है इसमें कभी कोई संदेह नहीं। वह उचित समय आने पर निश्चित रूप से उत्तम फल देता है।” ऐसा सोचकर वे निंदा, स्तुति की परवाह किए बिना ही, कर्म करने में लगे रहते हैं। ऐसे लोग सुख तो प्राप्त करना चाहते ही हैं, इसलिए स्वार्थी की परिधि में जरूर हैं,मग़र वे उत्तम श्रेणी के स्वार्थी हैं।
“दूसरे प्रकार के लोग ‘मध्यम स्वार्थी’ हैं। वे भी दूसरों को सुख देते हैं। परंतु उस दायरे तक जहां तक उन्हें कोई विशेष कष्ट न उठाना पड़े।” वे अपने कर्म फल के रूप में दूसरों से सुख प्राप्ति की आशा रखते हैं। वे दूसरों से सुख लेते भी हैं, और उन्हें सुख देते भी हैं। ये भी स्वार्थी लोग ही हैं। “परन्तु ये लोग पहले वालों से कुछ कम परोपकारी होने के कारण, मध्यम श्रेणी के ‘स्वार्थी’ कहलाते हैं। यहां तक भी ठीक है। ये लोग भी मानवता की परिभाषा में ही होते हैं, क्योंकि ऐसे लोग, कम से कम दूसरों को दुख तो नहीं दे रहे।”
पहले स्तर के ‘उत्तम-स्वार्थी’ लोग तो ‘देवतुल्य’ होते हैं।
दूसरे स्तर के ‘सामान्य- मनुष्य’ कहलाते हैं।
परंतु जो तीसरे स्तर के स्वार्थी हैं, जिनकी पहचान ‘निकृष्ट-स्वार्थी’ के रूप में की गई है, वे तो बहुत ही घटिया हैं। उन्हें हम सिर्फ “घटिया ही कह सकते हैं “घटिया लोग” भी नहीं क्योंकि वे “लोग” शब्द की परिभाषा से परे होने के कारण मनुष्यता की परिभाषा से बाहर हो जाते हैं।” क्योंकि वे दूसरों के विनाश में अपना स्वार्थ देखते हैं। इनको ‘निकृष्ट-स्वार्थी’ कहा जाना ही ठीक है।
संसार के लोगों से क्या !! एसों को हर स्तर पर ‘घृणा’ व ‘आलोचना’ ही मिलती है। वे इसी लायक होते हैं।
चौथे प्रकार को कोई संज्ञा देना भी मैं उचित नहीं समझता!
जो ‘अत्यन्त ही घटिया स्तर’ के होते हैं। “वे न तो स्वयं शांति से रहेंगे, और न ही दूसरों को रहने देंगे। वे धन-संपदा का केवल विनाश ही करेंगे। इसलिए वे ‘स्वार्थी’ की श्रेणी में भी नहीं आते। ऐसी विकृत मानसिकता वाले लोग तो ‘पागल’ कहलाते हैं।” उनके कार्यों में बुद्धिमत्ता तो कहीं होती ही नहीं।
इसलिए मेरा ऐसा मानना है कि, उनका नाक-नक्शा, शारीरिक डिजाइन भले ही मनुष्यों जैसा हो, फिर भी उनको मनुष्य की श्रेणी से बाहर ही समझना चाहिए।”
यदि आप संसार में सुखपूर्वक जीवन जीना चाहते हैं, तो आपको ये चारों प्रकार के व्यक्ति पहचानने ही होंगे।
“जो व्यक्ति इन चारों को पहचान लेगा, और पहले दो प्रकार के व्यक्तियों के साथ उचित व्यवहार करता हुआ, बाकी दो प्रकार के लोगों से किसी भी प्रकार अपने आपको बचा लेगा बस समझलो! उसे जीने की असली कला समझ आ गई है।
वही जीवन में सफल और सुखी हो सकता है। बाकी तो सब लोग दुख में हैं ही।”👍