वैसे तो अधिकतर लोग अपने दोष किसी को बताते नहीं। फिर भी कभी-कभी भोलेपन के कारण कुछ गलतियां हो भी जाती हैं। मेरे कहने का आशय है कि,सभी लोग अपना जीवन हमेशा सावधानी से एवं पूरी सूझ-बूझ के साथ जिएं
आवश्यकता पड़ने पर जीवन में अपने से अनुभवी लोगों, जैसे; माता-पिता एवं गुरुजनों या अपने किसी समझदार खास मित्र, रिश्तेदार अर्थात पात्र व्यक्तित्व (पत्नी भी मित्र ही होती है।) को ही अपनी परेशानी बताएं, सबको नहीं।”
इतना लम्बा जीवन है, सही ‘सूझ-बुझ से काम करें क्योंकि मनुष्य तो पहले से ही अल्पज्ञ है। उससे कभी न कभी, कहीं न कहीं, छोटी-बड़ी किसी भी प्रकार की गलती हो ही जाती है।
परंतु मनुष्य को सदैव सचेत रहना चाहिए ऐसा न हो कि, वही गलती बार-बार करके सॉरी बोलने की अपनी छबि बनाकर अपने आपको दूसरों की नज़रों से भी गिरा लें..।
अपने आचरण में ख़ुद के अनुभवों की सीख लेकर जीवन में आगे बढ़े..अबोध न बनें “कौन सा कार्य गलत है, और कौन सा सही..?” इसकी जानकारी सदैव अपने जहन में बिठाएं।
“सही और गलत को जानने पहचानने की अंतिम और निर्दोष कसौटी ईश्वर है। दूसरे कुछ हद तक खुद की अंतरात्मा भी। ध्यान रहे सर्वज्ञ ईश्वर ही है। जो कभी गलती नहीं करता। इसलिए सही-ग़लत के निर्णय हेतु ईश्वर पर “अटल विश्वास होना चाहिए।”
और दूसरी बात– हमारे कर्मों का अंतिम निर्णय भी ईश्वर को ही करना है। इस कारण से भी हमें ईश्वर का विधान जानना नितान्त आवश्यक है। “उसी की कसौटी पर सही गलत का निर्णय करना होगा, ताकि हम ईश्वर के न्यायालय में अपराधी होकर दंड के पात्र न बन पाएँ।”
अगर हम बेकार की चीजों में न उलझ कर.. वक़्त का सही सद्पयोग करें..तो ईश्वर ने चार वेदों में यह सब जानकारियां दे रखी हैं, कि कौन सा काम ठीक है, और कौन सा गलत। कौन सा काम करें, और कौन सा न करें। “
परन्तु फिर भी मनुष्य लोग, अलग-अलग देशों में, अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार सदैव कानून बनाते रहे हैं..और बनाते रहेंगे भी परन्तु वे अंतिम रूप से कभी प्रामाणिक नहीं होते!!
क्योंकि मनुष्य अल्पज्ञ है, वह कानून बनाने में, भाषा बोलने में, अथवा आचरण करने में, कहीं न कहीं गलतियां करता ही है।
इसीलिए आपने देखा या सुना होगा बार-बार संसद भवन में पिछले कानूनों पर बहस और संशोधन होते रहते हैं।
ऐसे लोग जो वेदों को जानते हों। और आपके सम्पर्क में हों तो अपने दोष उन्हें वे हिचक बता देने में कोई हर्ज नहीं है।
बताने से मेरा उद्देश्य सिर्फ अपने आप में ‘कन्फेश’ करने से है, कुछ और नहीं। ताकि आप अपने दोषों को, गलतियों को दूर करके अपने खुद के जीवन का आत्मचिंतन करके वक़्त रहते अपना जीवन सुधार सकें जिससे आपके दुख कम हो जाएं, और आपके जीवन में सुख बढ़ने लगें..जिससे जीवन की रुकी हुई गाड़ी पुनः खुशहाली की पटरी पर चलने लगे।
ये सच है सभी के माता पिता और वेदों के विद्वान सच्चे गुरु जी अपने बच्चे या शिष्य के सच्चे हितैषी होते हैं। वे हमेशा ठीक मार्गदर्शन ही करेंगे।” मग़र इनमें से कोई भी कड़ी अल्पज्ञ होने के कारण, या उनका दृष्टिकोण अलग होने से उनसे भी भूल चूक हो सकती है. वे भी आख़िर मनुष्य ही हैं।
परंतु वे आपके शत्रु विल्कुल नहीं हैं। इसलिए उनसे सहायता अवश्य लेनी चाहिए। वे आपकी कमियों को दूर करने में अपनी समझ के अनुसार कुछ न कुछ मदद ही करेंगे।
“बाई द वे कभी उनकी कोई बात, प्रमाण और तर्क से, आपको ईश्वरीय विधान अर्थात वेदों के विरुद्ध लगे, तो उसे भले ही आप छोड़ दे, उसे न मानें। परंतु 10 में से 7/8 बातें जो उनके द्वारा ठीक बताई गयी हों, कम से कम उनसे तो लाभ उठाएं।” अपने अक्ल के चक्षुओं से देख या समझकर ख़ुद के ‘सच्चे-हितैसी’ की पहचान कर अपनी परेशानी बताकर उनसे परामर्श लेकर जीवन में प्रगति कर लेनी चाहिए।
अन्य सामान्य सांसारिक लोग , या माता-पिता, गुरुजन किन्हीं कारणों वश वेदों को नहीं पढ़ पाए हैं, उनसे अपनी जटिल समस्याओं को शेयर न करें, वे उन परिस्थितियों को समझ पाने में लगभग असमर्थ होते हैं इसीलिए ये कहना भी गलत नहीं होगा कि, प्रायः वे आपके हितैषी नहीं होते।
बल्कि अपने अनुभव व समझ की कमी छुपाने में कभी कभी स्वार्थी और अवसरवादी भी हो सकते हैं। वे आपके दोषों और कमियों को जानकर उनका दुरुपयोग कर सकते हैं। आप को ब्लैकमेल कर सकते हैं। आप का शोषण भी कर सकते हैं। इसलिए जीवन को बड़ी सावधानी से जिएं।
व्यवहार रूपी पैमाने से उनका परीक्षण करें। उनमें से अच्छे लोगों को सहयोग दें, और स्वयं भी उनसे सहयोग लें।
अपनी सुरक्षा अपने हाथ में है। जीवन का छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा कोई भी निर्णय सदैव आपसी “सूझ-बुझ” से ही लें।
सम्भव हो सके तो गलतियाँ करने से बचें। यदि हो भी जाए, तो अपने अनुभवी बड़े बुजुर्गों से सहायता ले कर उन्हें शीघ्र दूर करें। किसी भी समस्या को लम्बा न खीचें तभी आपका जीवन सुंदर,सुखमय और शांतिपूर्ण बन पायेगा।
धन्यवाद👍