168- हम-कदम..

कौन थे.. वे हम-कदम..?

जब अस्पताल नहीं थे तो बच्चे की नाभि से नाल काटते थे।

क्या उस वक्त लोग उनकी जाति से अनजान थे..कि उनके हम-कदम किस जाति के हैं..?

मेरा मतलब पिता से भी पहले कौन सी जाति की महिला या पुरुष बच्चे को स्पर्श करते थे.. ?

मुंडन करते वक्त भी बच्चा किसी से स्पर्श होता होगा।

शादी के मंडप में वे ही हम-कदम नाईं और धोबी के रॉल में अपना काम करने को मौजूद रहते थे।

लड़की का पिता लड़के के पिता से इन दोनों के लिए पहनने के कपडे.. रजाई-बिस्तर आदि सिफारिश करके दिलवाता था।

आज भी वाल्मीकि लोगों के बनाये हुए सूप से ही छठ-पूजा होती है। क्या आपको लगता है..? उसे छठ-मां स्वीकार नहीं करती..?

कौन थे वे हम-कदम..? जब हैंडपम्प नहीं थे तब आपके घर में कुँए से पानी की व्यवस्था करते थे..?

भोजन के लिए पत्तल कौन लोग बनाते थे..? क्या उस कर्मठ-जाति का भान नहीं था..?

कौन थे वे धुरन्धर..? दुल्हन बनी बेटियों की डोली अपने कंधे पर मीलो-मील दूर से लाते थे। उनके जिन्दा रहते किसी की मजाल थी कि आपकी बिटिया को कोई छू भी दे। कितना बड़ा विश्वास था!! हम लोगों में एक दूसरे का।

कौन थे वे हम-कदम..? जिनके हाथो से बनाये मिटटी की सुराही से ज्येष्ठ-मास की गर्मी में आपकी आत्मा तृप्त हो जाया करती थी.. ?

कौन आपकी छान-झोपड़ियां तैयार करते थे..?

कहाँ हैं वे हम-कदम..? जो फसल काटकर अनाज घर तक सुरक्षित पहुंचाने में अन्नदाता के कंधे-से कंधा मिलाकर जी-जान से काम करते थे..?

मांफ कीजियेगा कौन थे वे लोग..? जो आपके अंतिम संस्कार.. ‘चिता’ तक जलाने में भी सहायक सिद्ध होते थे..?

मेरे कहने का आशय स्पष्ट है..जीवन से लेकर मृत्यु तक सबको कभी न कभी एक दूसरे को स्पर्श करते ही थे, वे लोग। इसीलिए वे “हम-कदम” थे उन्हें कभी अलग नहीं किया जा सकता। हमें उन हम कदमों का शुक्रगुज़ार होना चाहिए, न कि उन्हें हेय दृष्टि से देखकर दुत्कारना। और आज कुछ लोग कहते हैं जब छुआ-छूत अधिक था ?? अगर बहुत पहले..रहा हो तो मैं कह नहीं सकता..वो भी किसी पिछड़े क्षेत्र में आज की तरह पूरे देश में व्याप्त नहीं रहा होगा।

दरअसल, मेरा शोध कहता है ये छुआ-छूत की बीमारी मुगलों व अंग्रेजों की देन है और बाद में इन मौकापरस्त नेताओं ने अपनी वोट-नीति के लिए हम सबको विघटित करके रखने का बहुत बड़ा षड्यंत्र है।

चाहे उच्च स्तर पर देश-दुनियाँ के नक्शे में देखकर समझ लो या ग्राम-समाज व पारिवारिक स्तर पर.. देख कर समझ लो आपको हर तरफ ‘डिवाइड & रूल’ का ही खेल नज़र आएगा।

अभी भी वक्त है..!! समझ जाइयेगा..

पहले भी जातियाँ थी, पर उन लोगों के हिर्दय में एक दूसरे के प्रति प्रेम व सम्मान की एक धारा बहती थी। वे एक दूसरे की खैर-ख़बर रखते थे। जिसका कभी कोई उल्लेख नहीं करता था। तब जनसँख्या-घनत्व कम होने से परिवार के लोग अनुशासित भी रहते थे। आज ऐसा कम ही देखने को मिलता है।

अगर जातिवाद होता तो राम कभी सबरी के झूठे बेर ना खाते,

निषादराज, केवट, आदिवासी, वनवासी उनके सहायक कभी न होते।

लगभग दस वर्ष की उम्र से जब से होश संभाला है तब से मैं किसी न किसी प्लेट-फॉर्म से पुरज़ोर आग्रह करता रहा हूँ और शायद ताउम्र करता रहुँगा..” भाइयों जाति-धर्मों में मत टूटिए.. मानव-धर्म को तवज्जो दीजिए सब ठीक हो जाएगा। . . .

देश की कमजोर कड़ी मत बनिये । सभी अपने-अपने स्तर से अपने लोगों को समझाएं कि सभी जातियाँ समान और आदरणीय,पूज्यनीय हैं।

अगर खराब होता भी है तो कोई “व्यक्ति-विशेष” होता है। उससे सम्बन्धित सभी लोग नहीं। वैचारिक मुद्दा है विचार कीजियेगा। 👍

जय श्री राधे

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