165- सीख..

✍🏻 वृक्ष से सीखें..

“वृक्ष कभी भी गिरने वाले अर्थात अलग किए जाने वाले अपने फलों और फूलों के लिये परेशान नहीं होता है।”

मनुष्य का अजीज़ मित्र “वृक्ष” हमेशा नई कलियों को फूल बनाकर खिलाने व कच्चे फलों को पकाने की प्रकृति प्रदत्त अपनी प्रक्रिया में सदैव तल्लीन रहता है।

इस कथन से मेरा आशय भी कुछ वैसा ही है..कि, ‘मनुष्य’ भी उन चीजों में अपना “वक़्त” जाया करने के लिए नहीं बना है, जो प्रारब्धवश उससे दूर हो गई हैं या अपने जीवन को वो आकार नहीं दे सका है, जैसा उसने कभी सपना देखा था…या सोचा था.. !!

दरअसल, ‘मनुष्य’ ईश्वर की वो कृति है अर्थात उसमें वो सामर्थ्य है कि, वह मर्यादित रहते हुए अपने कार्य के प्रति समर्पित होकर स्वयं के अथक प्रयासों की से जो ठान ले, उसे प्राप्त कर लेने की सामर्थ्य रखता है।

इसीलिए..

हे मानव! तू वक़्त रहते सम्भल जा..!!इसी में तेरी भलाई है।

तू! ख़ुद को और अपनी क्षमताओं को जान ले, अपना ‘हरपल’ जीवन की बेहतरी में लगा दे।

Know your capabilities..& always do the “Best-Karma” for your life.. thanks 👍

: साभार 👍

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